Thursday, February 19, 2026

बिहार चुनाव बना यूपी का ‘सियासी रिहर्सल’, योगी-केशव बनाम अखिलेश में शह-मात का खेल शुरू

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लखनऊ/पटना: बिहार विधानसभा चुनाव का रण इस बार केवल पटना तक सीमित नहीं है इसकी गूंज लखनऊ तक सुनाई दे रही है। उत्तर प्रदेश की सत्ता के दो बड़े चेहरे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य बिहार में डेरा डाले हुए हैं। वहीं दूसरी ओर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव भी महागठबंधन के प्रचार में पूरी ताकत झोंक चुके हैं। सवाल यह है कि क्या बिहार की यह लड़ाई असल में यूपी के सियासी एजेंडे को सेट करने का मैदान बन गई है?

 

यूपी से सटी सीटों पर चुनावी जंग

बिहार की करीब तीन दर्जन विधानसभा सीटें उत्तर प्रदेश की सीमा से सटी हैं। इनमें सारण, सीवान, गोपालगंज, भोजपुर, कैमूर, बक्सर, रोहतास और पश्चिम चंपारण जैसे जिले शामिल हैं, जिनकी सीमाएं यूपी के महाराजगंज, देवरिया, बलिया, गाजीपुर और सोनभद्र जिलों से लगती हैं। भोजपुरी भाषा, समान संस्कृति और जातीय समीकरणों के कारण इन इलाकों की राजनीति का असर दोनों राज्यों में दिखता है। इसलिए पहले चरण में होने वाले चुनावों में यूपी नेताओं की भारी मौजूदगी है।

 

योगी–केशव की फील्ड मैनेजमेंट से लेकर अखिलेश के पीडीए फॉर्मूले तक

पिछले एक हफ्ते से सीएम योगी आदित्यनाथ बिहार में लगातार सभाएं कर रहे हैं। उनके साथ यूपी बीजेपी के चार दर्जन से अधिक वरिष्ठ नेता भी प्रचार में जुटे हैं। वहीं केशव प्रसाद मौर्य जमीनी स्तर पर एनडीए के प्रचार की कमान संभाल रहे हैं। योगी की सभाओं में आक्रामक हिंदुत्व की झलक साफ दिखाई देती है। खासतौर पर उन सीमावर्ती जिलों में जहां राजपूत मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वहीं दूसरी ओर, सपा प्रमुख अखिलेश यादव महागठबंधन के लिए प्रचार में उतरे हैं। उन्होंने छपरा में भोजपुरी स्टार खेसारी लाल यादव की सभा से प्रचार की शुरुआत की। अखिलेश अपने ‘पीडीए – पिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक’ फॉर्मूले के साथ वोट बैंक को एकजुट करने की कोशिश में हैं।

 

नेता दर नेता, हमला दर हमला

अखिलेश के मैदान में उतरते ही यूपी बीजेपी नेताओं ने तीखे हमले शुरू कर दिए। केशव प्रसाद मौर्य ने व्यंग्य करते हुए कहा, “यूपी की पार्टी, बिहार में प्रचार। न उम्मीदवार, न जमीन, फिर भी अहंकार का यकीन!” योगी आदित्यनाथ ने भी सीवान की रैली में बिना नाम लिए तंज कसा, “इंडिया गठबंधन के तीन बंदर हैं – पप्पू, टप्पू और अप्पू। एक सच बोल नहीं सकता, दूसरा सच देख नहीं सकता और तीसरा सच सुन नहीं सकता।” अखिलेश यादव ने जवाब में कहा, “ओसामा का मतलब शेर होता है, नाम बदलने वाले अब इसे ‘शेर सिंह’ कर देंगे क्या?”

 

बिहार से सेट होगा यूपी का एजेंडा?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार चुनाव का असर पूर्वांचल और यूपी की राजनीति पर सीधा पड़ेगा। यदि एनडीए को जीत मिलती है तो इससे बीजेपी को यूपी सहित आने वाले राज्यों के चुनाव में बढ़त मिलेगी। लेकिन अगर महागठबंधन को सफलता मिलती है, तो विपक्षी खेमे में नई ऊर्जा और आत्मविश्वास का संचार होगा। दरअसल, बिहार और यूपी के सीमावर्ती जिलों में रोटी-बेटी का रिश्ता गहराई से जुड़ा है यही कारण है कि बिहार की सियासी हवा का रुख यूपी में भी महसूस किया जाता है। बसपा सुप्रीमो मायावती भी इन इलाकों में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रही हैं, जिससे मुकाबला और दिलचस्प हो गया है।

बिहार का चुनावी संग्राम अब केवल विधानसभा तक सीमित नहीं रहा। यह उत्तर प्रदेश के भविष्य के सियासी समीकरणों की झलक भी दे रहा है। इस बार मुकाबला सिर्फ सीटों का नहीं, बल्कि सियासी प्रभाव और लोकप्रियता के विस्तार का है और यही वजह है कि बिहार की मिट्टी पर यूपी की सियासत की बिसात बिछाई जा रही है।

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