Friday, February 20, 2026

शराब के साथ चखना खाने का चलन कब से हुआ शुरू, जानें क्या है इसका इतिहास

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नेशनल डेस्क : भारत में शराब पीने की संस्कृति में ‘चखना’ का स्थान इतना अटूट हो चुका है कि बिना इसके शराब का मजा ही अधूरा लगता है। मूंगफली हो या कबाब, चिप्स हो या तंदूरी चिकन हर घूंट के साथ कुछ न कुछ चबाना अब हमारी दिनचर्या का हिस्सा बन गया है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि यह परंपरा नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी है?

 

प्राचीन सभ्यताओं से चली आ रही परंपरा

दुनिया की लगभग हर सभ्यता में शराब के साथ कुछ न कुछ खाने की परंपरा रही है। इसका मुख्य कारण यह है कि भोजन शराब की तीक्ष्णता को कम करता है, पाचन में मदद करता है और पीने का अनुभव लंबा व मजेदार बनाता है।

 

न्यू ऑरलियंस से मिली प्रेरणा

1930 के दशक में अमेरिका के न्यू ऑरलियंस शहर के बार मालिकों ने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए एक अनोखा तरीका अपनाया। वे हर ड्रिंक के साथ मुफ्त में एक प्लेट भोजन परोसते थे। उनका मानना था कि जितना भारी भोजन होगा, ग्राहक उतनी ही ज्यादा शराब आराम से पी पाएगा। यही विचार धीरे-धीरे दुनिया भर में फैला और भारत में भी चखना संस्कृति को मजबूती मिली।

 

मुगल दरबारों का शाही चखना

मुगल काल में शराब के साथ बेहद शानदार व्यंजन परोसे जाते थे। खजूर, खुबानी, अंजीर, बादाम, पिस्ता जैसे ड्राई फ्रूट्स के साथ भुना हुआ मांस और विभिन्न प्रकार के कबाब शाही दावतों का हिस्सा होते थे। यह परंपरा आज भी उत्तर भारत के कई इलाकों में कबाब और तंदूरी व्यंजनों के रूप में जीवित है।

 

क्षेत्रीय स्वाद, अलग-अलग चखना

भारत के अलग-अलग हिस्सों में चखना भी स्थानीय स्वाद के अनुसार बदलता रहा:

 

महाराष्ट्र में मूंगफली और उबले अंडे सबसे लोकप्रिय रहे।

 

पंजाब में तंदूरी चिकन, पनीर टिक्का और सीख कबाब का बोलबाला है।

 

पूर्वोत्तर राज्यों में स्मोक्ड पोर्क और अन्य स्मोक्ड मीट पसंद किए जाते हैं।

 

महानगरों में आजकल पिज्जा, मोमोज, चाइनीज मंचूरियन और फ्राइड आइटम्स ने जगह बना ली है।

 

1970-90 का दौर: मूंगफली-अंडे का जलवा

सत्तर और नब्बे के दशक में पूरे देश में सस्ता और आसानी से उपलब्ध होने के कारण मूंगफली और उबले अंडे चखने के रूप में छा गए। दिलचस्प बात यह है कि मूंगफली में विटामिन बी9 (फोलेट) प्रचुर मात्रा में होता है, जो शराब के नशे को कुछ हद तक कम करने में मदद करता है। आज भी चखना शराब का सबसे अच्छा साथी बना हुआ है। चाहे घर पर पार्टी हो या बार में बैठकी, बिना चखने के मजा अधूरा ही रहता है। अगली बार जब आप ग्लास उठाएं तो याद रखिए यह सिर्फ स्नैक्स नहीं, सदियों पुरानी परंपरा का हिस्सा है।

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