तकनीक की दुनिया में इन दिनों एक नया शब्द ‘वाइब कोडिंग’ (Vibe Coding) की गूंज चारों ओर है। सिलिकॉन वैली से लेकर भारतीय टेक हब तक, हर दिग्गज इस पर अपनी राय रख रहे हैं। लेकिन यह ‘वाइब’ आखिर है क्या और क्यों दुनिया के सबसे बड़े टेक सीईओ इस पर आपस में भिड़ गए हैं? आइए जाते हैं…
क्या है वाइब कोडिंग?
सरल शब्दों में कहें तो वाइब कोडिंग सॉफ्टवेयर बनाने का वह तरीका है जहां आपको पायथन (Python) या जावास्क्रिप्ट (JavaScript) जैसी कठिन भाषाएं सीखने की जरूरत नहीं होती। आप एआई (AI) को अपनी सामान्य भाषा (जैसे हिंदी या अंग्रेजी) में बताते हैं कि आपको कैसा एप या फीचर चाहिए, और एआई आपके लिए उसका कोड तैयार कर देता है। इस शब्द को फरवरी 2025 में ओपनएआई (OpenAI) के को-फाउंडर आंद्रे कार्पेथी ने लोकप्रिय बनाया था। उनका कहना है कि एआई अब इतना काबिल हो गया है कि यूजर को कोड की चिंता करने की जरूरत ही नहीं है।
सुंदर पिचाई की क्या राय है?
Google के सीईओ सुंदर पिचाई ने इस ट्रेंड को सकारात्मक बताया है। उनका कहना है कि इससे कोडिंग पहले से ज्यादा आसान और दिलचस्प हो रही है। उनके मुताबिक, यह तकनीक भविष्य में और बेहतर होगी और ज्यादा लोगों के लिए डेवलपमेंट को सुलभ बनाएगी।
श्रीधर वेंबू क्यों कर रहे हैं विरोध?
वहीं Zoho के फाउंडर श्रीधर वेंबू इस ट्रेंड से पूरी तरह सहमत नहीं हैं। उनका मानना है कि वाइब कोडिंग को जरूरत से ज्यादा सरल तरीके से पेश किया जा रहा है, जबकि असल में कोडिंग एक जटिल प्रक्रिया है जिसे पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
क्या है इसका भविष्य?
वाइब कोडिंग को मानव और एआई के सहयोग का नया उदाहरण माना जा रहा है। आने वाले समय में यह पारंपरिक प्रोग्रामिंग को पूरी तरह बदल सकता है या उसके साथ मिलकर काम कर सकता है।


