लखनऊ- 13 वर्षीय उनैज खान की मौत का मामला, नागरिक। संगठनों ने सीपी के नाम सौंपा ज्ञापन, SI हजरतगंज सुधाकर सिंह को सौंपा ज्ञापन, जांच की निष्पक्षता, पारदर्शिता पर सवाल किए, आरोपी संजीव त्रिपाठी की गिरफ्तारी की मांग
लखनऊ एयरपोर्ट पर धुंध के असर से उड़ानें प्रभावित,
लखनऊ- एयरपोर्ट पर धुंध के असर से उड़ानें प्रभावित, हैदराबाद से आई इंडिगो उड़ान लैंड नहीं कर सकी, लो विजिबिलिटी के कारण विमान दिल्ली डायवर्ट, लखनऊ से दिल्ली जाने वाली फ्लाइट 1 घंटे लेट, दम्माम जाने वाली फ्लाइनेस उड़ान देरी से रवाना, बेंगलुरु जाने वाली इंडिगो फ्लाइट सवा घंटे लेट, अबूधाबी से लखनऊ आने वाली फ्लाइट रद्द, शारजाह से आने वाली फ्लाइट भी कैंसिल हुई, अबूधाबी, दम्माम, शारजाह की उड़ानें भी रद्द
लखनऊ यूपी में तेल गैस की किल्लत पर फैलाई अफवाह तो खैर नहीं।
लखनऊ- यूपी में तेल गैस की किल्लत पर फैलाई अफवाह तो खैर नहीं।
सीएम योगी ने सभी DM, पुलिस कप्तानों को दिए सख्त निर्देश।
गैस, तेल की कालाबाजारी किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं, अफवाह फैलाने वाले नहीं जाएंगे बक्से- सीएम।
सीएम योगी के निर्देश के बाद पुलिस मुख्यालय व जिला स्तर पर सोशल मीडिया में रखी जा रही है नजर।
अफवाह फैलाने वालों पर की जाएगी कड़ी कार्रवाई।
सभी जिलों की पुलिस पेट्रोल पंप के आस पास नजर बनाए रखने के दिए निर्देश।
जिला प्रशासन व आपूर्ति विभाग गैस की दुकानों में निरक्षण करने के दिए निर्देश।
गैस का अवैध रूप से भंडारण करने वालों के खिलाफ की जाएगी कार्रवाई।।
पंजाब में आएगा आंधी-तूफान, लगातार 3 दिन हो सकती है बारिश
पंजाब डेस्क : गर्मी का सामना कर रहे पंजाब और चंडीगढ़ के लोगों को आने वाले दिनों में मौसम में बदलाव देखने को मिल सकता है। मौसम विभाग के अनुसार 14 मार्च से कई इलाकों में गरज-चमक के साथ बारिश होने की संभावना है। यह सिलसिला करीब तीन दिन तक जारी रह सकता है, जिस दौरान 30 से 40 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से तेज हवाएं भी चल सकती हैं।
मौसम विभाग के अनुसार अगले दो दिनों तक तापमान में ज्यादा बदलाव नहीं होगा, लेकिन 14 से 16 मार्च के तक हल्की से मध्यम बारिश हो सकती है। इस कारण तापमान में गिरावट आ सकती है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह बदलाव एक नए वेस्टर्न डिस्टर्बेंस के सक्रिय होने के कारण होगा। जिससे आने वाले दिनों में मौसम के करवट लेने की संभावना जताई जा रही है।
संसद के बजट सत्र के दौरान LPG सिलेंडरों की कमी को लेकर कांग्रेस सांसदों ने केंद्र सरकार के खिलाफ किया विरोध प्रदर्शन
नेशनल डेस्क: संसद के बजट सत्र के दौरान बुधवार को विपक्षी दलों ने केंद्र सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। देश भर में कमर्शियल एलपीजी (LPG) सिलेंडरों की भारी किल्लत और पश्चिम एशिया (West Asia) संकट के प्रभाव को लेकर कांग्रेस सहित ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन के सांसदों ने संसद परिसर में विरोध प्रदर्शन किया।
PM is compromised का बैनर लेकर किया प्रदर्शन
इस विरोध प्रदर्शन में कांग्रेस सांसद प्रियंका गांधी वाड्रा भी शामिल हुईं। विपक्षी सांसदों के हाथों में “PM is compromised” (प्रधानमंत्री ने समझौता कर लिया है) लिखे हुए बैनर थे। सांसदों ने आरोप लगाया कि सरकार पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष के कारण उत्पन्न हुए ऊर्जा संकट को संभालने में पूरी तरह विफल रही है।
आयात पर निर्भरता और सरकार की ‘जिम्मेदारी से भागने’ का आरोप
कांग्रेस सांसद सुखदेव भगत ने ANI से बातचीत में केंद्र पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा “प्रधानमंत्री मोदी ने 2022 में वादा किया था कि हम आयात कम करेंगे, लेकिन आज स्थिति इसके उलट है। हम दूसरे देशों पर और अधिक निर्भर हो गए हैं। युद्ध का असर अब साफ दिखने लगा है और सरकार अपनी जिम्मेदारियों से भाग रही है। संसद में इस पर विस्तृत चर्चा होनी चाहिए।” वहीं, कांग्रेस सांसद प्रमोद तिवारी ने कहा कि सरकार पश्चिम एशिया संघर्ष से उत्पन्न होने वाले खतरों का अंदाजा लगाने में नाकाम रही है।
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PM मोदी Compromised हैं, ब्लैकमेल हो रहे हैं।
देश में LPG की किल्लत हो गई है.. लोग परेशान हैं, लेकिन सरकार झूठ बोलने से बाज नहीं आ रही।
अपनी इमेज बचाने के लिए नरेंद्र मोदी ने देश के हितों का सौदा कर दिया है- ‘नाम नरेंदर, काम सरेंडर’
📍 दिल्ली pic.twitter.com/vMjS3NPWx5
— Congress (@INCIndia) March 11, 2026
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आवश्यक वस्तु अधिनियम (ECA) लागू, होटलों पर ताले लगने की नौबत
पश्चिम एशिया संकट के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति बाधित हुई है। इसके जवाब में केंद्र सरकार ने आवश्यक वस्तु अधिनियम (Essential Commodities Act) लागू कर दिया है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं, अस्पतालों और आवश्यक सेवाओं को प्राथमिकता देते हुए कई क्षेत्रों में कमर्शियल एलपीजी के वितरण पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके अलावा, घरेलू गैस रिफिल के लिए 25 दिनों की इंटर-बुकिंग अवधि अनिवार्य कर दी गई है।
सीपीएम (CPI-M) सांसद वी. शिवदासन ने आरोप लगाया कि एलपीजी की कमी के कारण कई होटल बंद हो रहे हैं और आम परिवार परेशान हैं। उन्होंने इस मुद्दे पर राष्ट्रव्यापी अभियान चलाने की चेतावनी दी है। सीपीआई (CPI) सांसद पी. संदोष कुमार ने इस विषय पर राज्यसभा में कामकाज स्थगित करने (Suspension of Business) का नोटिस भी दिया है।
भारत को रूसी तेल राहत पर अमेरिका का बड़ा बयानः दुनिया के हित में लिया फैसला, रूस को नहीं होगा कोई लाभ
Washington: ईरान संकट और वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को लेकर बढ़ती चिंताओं के बीच अमेरिका ने भारत को रूसी तेल स्वीकार करने की अस्थायी अनुमति देने के अपने फैसले का बचाव किया है। व्हाइट हाउस की प्रेस सचिव Karoline Leavitt ने कहा कि भारत को दी गई यह छूट दुनिया के व्यापक हित में लिया गया फैसला है और इससे रूस को कोई बड़ा आर्थिक लाभ नहीं होगा। लेविट ने व्हाइट हाउस में संवाददाता सम्मेलन में कहा कि यह निर्णय राष्ट्रपति Donald Trump, वित्त मंत्री Scott Bessent और राष्ट्रीय सुरक्षा टीम ने मिलकर लिया।उन्होंने कहा कि मौजूदा समय में Iran के साथ बढ़ते तनाव के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति में अस्थायी कमी की आशंका है। ऐसे में ऊर्जा बाजार को स्थिर रखने के लिए भारत को समुद्र में पहले से मौजूद रूसी तेल स्वीकार करने की अस्थायी अनुमति दी गई है।
व्हाइट हाउस ने स्पष्ट किया कि जिस तेल की बात हो रही है वह पहले से ही समुद्र में जहाजों पर मौजूद था। इसलिए यह नया व्यापार नहीं है और इससे Russia को कोई बड़ा वित्तीय लाभ मिलने की संभावना नहीं है। अमेरिका ने भारत को रूसी तेल स्वीकार करने के लिए 30 दिनों की अस्थायी छूट दी है। यह कदम केवल ऊर्जा आपूर्ति में आई अस्थायी कमी को संतुलित करने के लिए उठाया गया है। इससे पहले ट्रंप प्रशासन ने रूस से तेल खरीदने को लेकर भारत पर 25 प्रतिशत दंडात्मक शुल्क लगाया था। अमेरिका का आरोप था कि रूस से ऊर्जा खरीदने से मॉस्को को Russia-Ukraine War में आर्थिक सहायता मिल रही है।
हालांकि बाद में अमेरिका और India के बीच व्यापार से जुड़ी अंतरिम समझौते की रूपरेखा तैयार होने के बाद ट्रंप प्रशासन ने वह शुल्क वापस ले लिया था। व्हाइट हाउस ने कहा कि भारत अमेरिका का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार है और उसने पहले ही प्रतिबंधित रूसी तेल खरीदना बंद कर दिया था। इसी वजह से मौजूदा संकट में भारत को यह अस्थायी राहत दी गई है। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला वैश्विक तेल बाजार में संभावित अस्थिरता को रोकने और अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा आपूर्ति को संतुलित रखने की रणनीति का हिस्सा है।
क्यों बेटे मोजतबा को ईरान का सुप्रीम लीडर नहीं बनाना चाहते थे अली खामेनेई, वसीयत में जताई ये इच्छा
इंटरनेशनल डेस्क : ईरान में नए सुप्रीम लीडर की नियुक्ति को लेकर बड़ा राजनीतिक विवाद सामने आया है। कई रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की मौत के बाद उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को देश का सर्वोच्च नेता बनाए जाने पर देश के अंदर और बाहर दोनों जगह सवाल उठ रहे हैं। आलोचकों का कहना है कि यह फैसला सामान्य प्रक्रिया के तहत नहीं लिया गया और इसमें ईरान की शक्तिशाली सैन्य संस्था की अहम भूमिका रही।
एयरस्ट्राइक में अली खामेनेई की मौत का दावा
कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, ईरान के पूर्व सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की 28 फरवरी को एक एयरस्ट्राइक में मौत हो गई थी। हालांकि इस घटना को लेकर आधिकारिक स्तर पर बहुत कम जानकारी सामने आई है। इसके बाद ईरान में नए सुप्रीम लीडर के चयन की प्रक्रिया शुरू हुई।
रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया है कि अली खामेनेई ने अपनी वसीयत में यह इच्छा जताई थी कि उनके बेटे मोजतबा खामेनेई को उनका उत्तराधिकारी न बनाया जाए। कहा जाता है कि उन्हें अपने बेटे की राजनीतिक क्षमता और अनुभव को लेकर संदेह था।
पिता को बेटे की योग्यता पर था संदेह
कुछ विश्लेषकों और ईरानी विपक्ष से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि अली खामेनेई को लगता था कि मोजतबा खामेनेई के पास देश का नेतृत्व करने के लिए पर्याप्त अनुभव नहीं है। उनका मानना था कि मोजतबा एक युवा धर्मगुरु हैं, लेकिन उन्होंने राजनीति या प्रशासन में कोई बड़ी उपलब्धि हासिल नहीं की है। विशेषज्ञों के मुताबिक, मोजतबा की पहचान लंबे समय तक मुख्य रूप से अपने पिता की वजह से ही बनी रही। इसी कारण कई लोग यह मानते हैं कि उन्हें इतनी बड़ी जिम्मेदारी देना उचित नहीं है।
सुप्रीम लीडर चुनने की प्रक्रिया क्या होती है
ईरान में सुप्रीम लीडर का चयन आमतौर पर असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नाम की संस्था करती है। यह धार्मिक विद्वानों और वरिष्ठ धर्मगुरुओं की परिषद होती है, जिसका काम देश के सर्वोच्च नेता का चुनाव करना होता है। सामान्य तौर पर परिषद के सदस्य बैठक करते हैं, उम्मीदवारों पर चर्चा होती है और फिर मतदान के जरिए नया सुप्रीम लीडर चुना जाता है। लेकिन इस बार इस प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।
नियुक्ति की प्रक्रिया पर लगे दबाव के आरोप
कुछ रिपोर्टों में दावा किया गया है कि मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति सामान्य मतदान प्रक्रिया से नहीं हुई। आरोप है कि ईरान की शक्तिशाली सैन्य संस्था इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) ने इस मामले में दबाव डाला। कहा जा रहा है कि जब असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स इस मुद्दे पर चर्चा कर रही थी, तब IRGC ने परिषद पर दबाव बनाकर फैसला मोजतबा के पक्ष में करवाया। यह भी दावा किया गया है कि उन्हें परिषद में स्पष्ट बहुमत का समर्थन नहीं मिला था। कुछ सूत्रों के मुताबिक, कई धर्मगुरुओं ने इस बैठक का विरोध करते हुए उसका बहिष्कार भी किया था। उनका मानना था कि चयन प्रक्रिया पारदर्शी नहीं थी।
‘कठपुतली नेता’ बनने का आरोप
कुछ विशेषज्ञों का कहना है कि ईरान की सैन्य और सुरक्षा संस्थाएं मोजतबा खामेनेई को ऐसा नेता मानती हैं जिसे आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। उनका दावा है कि इसी वजह से उन्हें इस पद पर लाने की कोशिश की गई, ताकि वास्तविक सत्ता पर सैन्य संस्थाओं का प्रभाव बना रहे। हालांकि इस तरह के आरोपों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि करना कठिन है।
अमेरिका की क्या प्रतिक्रिया रही?
मोजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने को लेकर अमेरिका की ओर से भी तीखी प्रतिक्रिया सामने आई है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस नियुक्ति पर नाराजगी जताते हुए कहा कि ईरान को ऐसा नेता चुनना चाहिए जो क्षेत्र में शांति और स्थिरता ला सके। ट्रंप ने यह भी कहा कि अगर ईरान में ऐसा नेता सत्ता में आता है जो पहले की कठोर नीतियों को ही जारी रखेगा, तो आने वाले वर्षों में तनाव और बढ़ सकता है। उन्होंने चेतावनी दी कि इससे भविष्य में बड़े संघर्ष की स्थिति भी पैदा हो सकती है।
बिना सरकारी पद के बने सुप्रीम लीडर
मोजतबा खामेनेई की नियुक्ति को लेकर एक और चर्चा यह है कि उन्होंने पहले कभी कोई बड़ा सरकारी पद नहीं संभाला। उनका प्रभाव मुख्य रूप से अपने पिता के करीबी सहयोगी के रूप में काम करने से बढ़ा था। कई पुराने कूटनीतिक दस्तावेजों में उन्हें पर्दे के पीछे से प्रभाव रखने वाला व्यक्ति बताया गया था। कुछ आरोप यह भी लगे थे कि उन्होंने अतीत में ईरान के राष्ट्रपति चुनावों को प्रभावित करने में भूमिका निभाई थी, हालांकि इन आरोपों की पुष्टि नहीं हो पाई थी।
इजरायल की चेतावनी
इस बीच इजरायल की सेना ने भी चेतावनी दी है कि यदि ईरान का कोई भी नेता आतंकवाद से जुड़े अभियानों को आगे बढ़ाता है, तो उसे सुरक्षा खतरे के रूप में देखा जाएगा। इजरायल का कहना है कि वह अपने खिलाफ किसी भी गतिविधि को रोकने के लिए कठोर कदम उठाने से पीछे नहीं हटेगा।

