Sunday, February 15, 2026

किडनी की बीमारी के गंभीर मरीजों के लिए राहत की खबर, स्टैटिन थेरेपी से घट सकता है मौत का खतरा

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नेशनल डेस्क :  दुनियाभर में किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित मरीजों की संख्या लगातार बढ़ रही है। कई मामलों में बीमारी इतनी गंभीर हो जाती है कि मरीजों को इलाज के लिए ICU में भर्ती करना पड़ता है। ऐसे मरीजों में जान का खतरा काफी अधिक होता है। लेकिन अब इस दिशा में एक नई उम्मीद सामने आई है।

अमेरिका में की गई एक बड़ी ऑब्जर्वेशनल स्टडी में पाया गया है कि किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के लिए स्टैटिन थेरेपी (Statin Therapy) काफी लाभकारी साबित हो सकती है। इस रिसर्च को यूरोपियन जर्नल और साइंटिफिक रिपोर्ट्स में प्रकाशित किया गया है।

स्टडी के मुताबिक, अगर गंभीर किडनी रोगियों को स्टैटिन थेरेपी दी जाए, तो 30 दिनों के भीतर मृत्यु का खतरा काफी हद तक कम हो सकता है। शोध में यह भी बताया गया कि ऐसे कई मरीजों में इंट्रासेरेब्रल हैमरेज यानी ब्रेन ब्लीड की समस्या देखने को मिलती है, जो एक गंभीर और जानलेवा स्थिति मानी जाती है। स्टैटिन दवाएं इस खतरे को कम करने में मदद कर सकती हैं।

कैसे की गई यह रिसर्च?

इस अध्ययन में करीब 1,900 ऐसे मरीजों को शामिल किया गया, जो किडनी की गंभीर बीमारी से पीड़ित थे और ICU में भर्ती थे। इनमें से 654 मरीजों को ICU के दौरान स्टैटिन थेरेपी दी गई, जबकि बाकी मरीजों को यह दवा नहीं दी गई। रिसर्च के नतीजों में सामने आया कि जिन मरीजों को स्टैटिन दी गई, उनमें 30 दिन के भीतर मृत्यु दर काफी कम रही। कुल मिलाकर स्टैटिन थेरेपी से मौत का खतरा लगभग 52 प्रतिशत तक घट गया।

शोधकर्ताओं के अनुसार, स्टैटिन केवल कोलेस्ट्रॉल कम करने वाली दवा नहीं है, बल्कि यह सूजन को कम करने, रक्त नलिकाओं की कार्यक्षमता सुधारने और एक्यूट किडनी डिजीज व ब्रेन ब्लीड जैसी स्थितियों में भी लाभ पहुंचा सकती है। हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि हर मरीज में स्टैटिन शुरू करने का फैसला उसकी व्यक्तिगत मेडिकल स्थिति को देखकर ही किया जाना चाहिए।

कैसे दी जाती है स्टैटिन थेरेपी?

स्टैटिन थेरेपी शुरू करने से पहले डॉक्टर मरीज का लिपिड प्रोफाइल, हार्ट और किडनी से जुड़े जरूरी टेस्ट करते हैं। ICU में भर्ती मरीजों की स्थिति को पहले स्थिर किया जाता है। इसके बाद मरीज की हालत के अनुसार उपयुक्त स्टैटिन दवा चुनी जाती है और आमतौर पर कम डोज से इलाज की शुरुआत की जाती है। यह दवा मरीज को मुंह से या फीडिंग ट्यूब के जरिए दी जा सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिसर्च किडनी की गंभीर बीमारी से जूझ रहे मरीजों के इलाज में एक नई दिशा दिखा सकती है, लेकिन इलाज हमेशा डॉक्टर की सलाह और निगरानी में ही किया जाना चाहिए।

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