Thursday, February 12, 2026

सैलून वालों सावधान! खराब हेयरकट का मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, महिला को मिला ₹25 लाख का मुआवजा

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नेशनल डेस्क: नई दिल्ली के एक प्रतिष्ठित होटल में हेयरकट को लेकर शुरू हुआ विवाद कई साल बाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले के साथ खत्म हुआ। शीर्ष अदालत ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन द्वारा दिए गए भारी मुआवजे को अत्यधिक बताते हुए कम कर दिया और अंतिम राशि 25 लाख रुपये तय की। यह मामला उस समय चर्चा में आया जब एक महिला ने दावा किया कि उनकी इच्छा के खिलाफ बाल बहुत छोटे काट दिए गए, जिससे उन्हें मानसिक परेशानी के साथ करियर से जुड़े नुकसान का सामना करना पड़ा।

सैलून विजिट से शुरू हुआ विवाद
यह घटना अप्रैल 2018 की है, जब मैनेजमेंट प्रोफेशनल और मॉडल आशना रॉय नई दिल्ली स्थित एक लक्जरी होटल के सैलून में गई थीं। उनका कहना था कि उन्होंने जिस तरह का हेयरकट चाहा था, वैसा न करते हुए स्टाइलिस्ट ने बाल काफी छोटे कर दिए। उनके अनुसार इस घटना से उन्हें मानसिक तनाव हुआ और मॉडलिंग से जुड़े अवसर भी प्रभावित हुए। इस शिकायत के बाद मामला उपभोक्ता आयोग तक पहुंचा, जहां सेवा में कमी मानते हुए आयोग ने उन्हें भारी मुआवजा देने का आदेश दिया। यह राशि दो बार तय की गई और हर बार लगभग 2 करोड़ रुपये देने की बात कही गई। होटल प्रबंधन ने इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।

सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी
मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने कहा कि सेवा में कमी साबित होने के बावजूद मुआवजे की राशि ठोस और विश्वसनीय साक्ष्यों पर आधारित होनी चाहिए। अदालत ने पाया कि नुकसान के समर्थन में प्रस्तुत दस्तावेज केवल फोटोकॉपी के रूप में थे और इतने बड़े दावे को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि मानसिक आघात के कारण मूल दस्तावेज खो जाने की दलील को मुआवजे का आधार नहीं बनाया जा सकता। अदालत के अनुसार उपभोक्ता विवादों में मुआवजा किसी अनुमान या भावनात्मक आधार पर तय नहीं किया जा सकता, बल्कि यह दिखाना जरूरी होता है कि वास्तविक आर्थिक नुकसान कितना हुआ है।

अंतिम फैसला और संदेश
इन सभी तथ्यों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मुआवजे की राशि घटाकर 25 लाख रुपये कर दी। अदालत ने अपने फैसले में यह भी कहा कि ऐसे मामलों में संतुलन बनाए रखना जरूरी है ताकि सेवा प्रदाताओं पर अनुचित बोझ न पड़े और शिकायतकर्ता को भी उचित राहत मिल सके। यह फैसला उपभोक्ता मामलों में साक्ष्यों की अहमियत को रेखांकित करता है और यह संदेश देता है कि न्यायिक प्रक्रिया में भावनाओं से ज्यादा महत्व प्रमाण और तथ्यों को दिया जाता है।

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