Sunday, March 8, 2026

ईरान में सत्ता का संकट: पड़ोसी देशों से माफी के बाद भी हमले जारी? तेहरान की सत्ता में बढ़ रहा अंदरूनी टकराव

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अमेरिका और इस्राइल के हमलों के बीच ईरान की सत्ता में हलचल तेज हो गई है। सुप्रीम लीडर अली खामेनेई की हाल ही में मौत के बाद देश के नेतृत्व को लेकर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। खामेनेई करीब 36 साल तक ईरान के सबसे प्रभावशाली नेता रहे और उनके रहते सत्ता के भीतर मतभेद खुलकर सामने नहीं आते थे। लेकिन अब उनकी मौत के बाद विभिन्न संस्थाओं और नेताओं के बीच खींचतान स्पष्ट दिख रही है।सवाल अब यह है कि खामेनेई की मौत के बाद युद्ध के दौरान असली निर्णायक शक्ति कौन है और कौन सी संस्था युद्ध के बड़े फैसले ले रही है।

राष्ट्रपति के बयान पर विवाद
ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन ने हाल ही में एक बयान दिया था, जिसमें उन्होंने अमेरिका-इस्राइल के हमलों के बीच पड़ोसी देशों से माफी मांगी और कहा कि ईरानी सेना तब तक किसी पड़ोसी देश पर हमला नहीं करेगी जब तक उसकी जमीन से ईरान पर हमला नहीं होता। उनके इस बयान के बाद आईआरजीसी और कई धार्मिक नेता उनके विरोध में खड़े हो गए। धार्मिक नेता हामिद रसाई ने सोशल मीडिया पर लिखा “मिस्टर पेजेकियन के कमजोर, अनप्रोफेशनल और पब्लिक ओपिनियन से मंजूर न होने वाले टेलीविजन मैसेज ने असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स के बोर्ड ऑफ डायरेक्टर्स और उसके मेंबर्स पर यह काम छोड़ दिया कि वे इस टेम्पररी काउंसिल की एक्टिविटीज़ को जल्द से जल्द खत्म करें, इसके लिए भविष्य के लीडर को इंट्रोड्यूस करें और इमाम खुमैनी और शहीद इमाम खामेनेई की क्रांति की सुरक्षा की गारंटी दें।

सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के सचिव अली लारिजानी ने कहा “जब दुश्मन इस इलाके में मौजूद बेस से हम पर हमला करता है, तो हम जवाब देते रहेंगे।” वहीं, न्यायपालिका प्रमुख गोलामहोसैन मोहसेनी-एजेई ने चेतावनी दी कि अमेरिकी हमलों में सहयोग करने वाले देशों के खिलाफ कार्रवाई जारी रह सकती है। इसके बाद राष्ट्रपति पेजेशकियन को अपना बयान वापस लेना पड़ा।

ईरान में नए नेतृत्व का समीकरण?
खामेनेई की मौत के बाद ईरान के संविधान के अनुसार तीन सदस्यीय अंतरिम नेतृत्व परिषद बनाई गई है। इसमें राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियन, न्यायपालिका प्रमुख गोलामहोसैन मोहसेनी-एजेई और गॉर्डियन काउंसिल द्वारा चुने गए धार्मिक विद्वान अलीरेजा अराफी शामिल हैं।

यह परिषद तब तक सत्ता का संचालन करेगी जब तक असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स नया सुप्रीम लीडर नहीं चुन लेती। हालांकि वर्तमान युद्ध की परिस्थितियों में यह संवैधानिक ढांचा पूरी तरह प्रभावी नहीं दिख रहा है। कई अहम युद्ध और सुरक्षा संबंधी फैसले अब विभिन्न शक्तिशाली संस्थाओं और सैन्य इकाइयों के प्रभाव में लिए जा रहे हैं।

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