नई दिल्ली। आज के समय में व्यक्ति की पहचान के लिए फिंगर प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया जाता है। क्राइम की दुनिया में भी अपराधी को पकड़ने के लिए यह एक बड़ा जरिया माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं फिंगरप्रिंट तकनीक का ख्याल सबसे पहले किसे आया था?
आपको बता दें कि इस क्रांतिकारी तकनीक की नींव स्कॉटलैंड के चिकित्सक और वैज्ञानिक हेनरी फॉल्ड्स ने रखी थी। उन्होंने दुनिया के सामने यह साबित किया कि हर व्यक्ति की उंगलियों के निशान पूरी तरह से अलग होते हैं। आइए जानें इस महान वैज्ञानिक की कहानी।
13 साल की उम्र में नौकरी
हेनरी फॉल्ड्स का जन्म 1 जून 1843 को स्कॉटलैंड के बीथ शहर में हुआ था। शुरुआत में उनका परिवार काफी खुशहाल और संपन्न था, लेकिन बैंक ऑफ ग्लासगो के डूबने के कारण उनके परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। हालात इतने खराब हो गए कि सिर्फ 13 साल की उम्र में हेनरी को अपनी पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी।
उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की और बाद में एक शॉल बनाने वाले के पास ट्रेनी की तरह काम करना शुरू कर दिया, लेकिन हेनरी के अंदर सीखने की ललक कम नहीं हुई थी। कुछ सालों बाद उन्होंने खुद के दम पर दोबारा पढ़ाई शुरू की। उन्होंने ग्लासगो यूनिवर्सिटी से गणित, तर्कशास्त्र और क्लासिक्स की शिक्षा ली। इसके बाद चिकित्सा विज्ञान में अपनी रुचि के चलते उन्होंने एंडरसन कॉलेज से डॉक्टर की डिग्री हासिल की।
भारत से जापान तक दीं अपनी सेवाएं
डॉक्टर बनने के बाद हेनरी फॉल्ड्स चर्च ऑफ स्कॉटलैंड के मेडिकल मिशनरी बन गए। साल 1871 में उन्हें भारत के दार्जिलिंग में स्थित गरीबों के अस्पताल में सेवा देने के लिए भेजा गया। इसके दो साल बाद वे जापान पहुंचे, जहां उन्होंने टोक्यो के सुकिजी इलाके में पहला स्कॉटिश मिशन अस्पताल खोला और मेडिकल छात्रों को पढ़ाने के लिए एक सेंटर भी स्थापित किया।
जापान में रहते हुए उन्होंने हैजा और रेबीज जैसी खतरनाक बीमारियों को फैलने से रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। यही नहीं, उन्होंने जापान की पहली नेत्रहीन सहायता संस्था और नेत्रहीनों के लिए स्पेशल स्कूल की शुरुआत करने में भी अपना अहम योगदान दिया।
मिट्टी के बर्तनों से आया फिंगरप्रिंट का ख्याल
1870 के दशक में जब हेनरी टोक्यो में काम कर रहे थे, तब वे एक अमेरिकी आर्कियोलॉजिस्ट एडवर्ड सिल्वेस्टर मोर्स के साथ ओमोरी क्षेत्र में चल रही एक खुदाई को देखने गए। वहां उन्होंने पुराने मिट्टी के बर्तनों पर कुम्हारों की उंगलियों के निशान देखे। बस, यहीं से उनके दिमाग में एक आइडिया आया कि क्या हर व्यक्ति के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं?
इसके बाद उन्होंने कई लोगों के उंगलियों के निशान जमा किए और उन पर गहरा अध्ययन किया। आखिरकार वे इस नतीजे पर पहुंचे कि दुनिया में हर इंसान के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं और ये जीवनभर कभी नहीं बदलते।
जब फिंगरप्रिंट से बचाई एक निर्दोष की जान
हेनरी फॉल्ड्स की इस खोज का पहली बार क्राइम फील्ड में इस्तेमाल तब हुआ, जब टोक्यो अस्पताल में चोरी हुई। पुलिस ने शक के आधार पर एक व्यक्ति को आरोपी मान लिया, लेकिन फॉल्ड्स ने घटनास्थल पर मिले फिंगरप्रिंट मिलाकर उस व्यक्ति को निर्दोष साबित किया।
बाद में असली चोर पकड़ा गया और इतिहास में यह पहला केस दर्ज हुआ, जब फिंगरप्रिंट के जरिए किसी को न्याय मिला और असली अपराधी की पहचान हुई। साल 1880 में हेनरी ने नेचर जर्नल में अपना यह खोज पब्लिश कराया और दुनिया को बताया कि अपराध की जांच में फिंगरप्रिंट कितने कारगर साबित हो सकते हैं। इस महान वैज्ञानिक का निधन 24 मार्च 1930 को हुआ, लेकिन उनका यह काम आज भी फॉरेंसिक साइंस की रीढ़ बना हुआ है।


