नई दिल्ली। न्याय के मंदिर में जब कानून के ज्ञाताओं की साख पर सवाल उठे, तो सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख अख्तियार करना स्वाभाविक है।
कोर्ट ने देश में लॉ कॉलेजों की गिरती गुणवत्ता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (बीसीआई) के दोहरे रवैये पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई है। इसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि गैराज जैसी जगहों से चलने वाले लॉ कॉलेजों को बीसीआई द्वारा मान्यता देना बेहद चिंताजनक विषय है।
बीसीआई के दोहरे रवैये पर कोर्ट की तीखी टिप्पणी
यह मामला 50 वर्षीय चार्टर्ड अकाउंटेंट के.आर. सुदर्शन से जुड़ा है, जिन्होंने वकालत की डिग्री हासिल की है। उनके खिलाफ एक आपराधिक मामला लंबित होने के कारण तमिलनाडु और पुडुचेरी बार काउंसिल ने वकील के रूप में उनका नामांकन रोक दिया।
जब बीसीआई के वकील ने इस मामले में ‘व्यापक चिंता’ की बात कही, तो जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस आर. महादेवन की पीठ भड़क गई। पीठ ने बीसीआई के रुख पर सवाल उठाते हुए कहा कि काउंसिल एक तरफ आपराधिक मामलों के दोषियों को नामांकन दे रही है, वहीं दूसरी तरफ लंबित मामलों वाले योग्य उम्मीदवारों का रास्ता रोक रही है।
कानून के दायरे से बाहर पाबंदी और राहत की गुहार
सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने दलील दी कि देश में गंभीर अपराधों के दोषियों तक का नामांकन हुआ है, जबकि याचिकाकर्ता पर महज एक कंपनी को सलाह देने का आरोप है।
पीठ ने माना कि एडवोकेट्स एक्ट, 1961 की धारा 24ए के तहत केवल आपराधिक मामला लंबित होने के आधार पर नामांकन रोकना गैर-कानूनी है। हाईकोर्ट के पुराने निर्देशों के आधार पर बीसीआई द्वारा बनाए गए नियमों को कोर्ट ने कानून के दायरे से बाहर बताया। इस मामले की वैधानिकता अब मद्रास हाईकोर्ट की पांच जजों की बड़ी पीठ के समक्ष लंबित है।


