Saturday, February 21, 2026
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बिहार चुनाव में 2 लाख से अधिक मतदाताओं ने दबाया NOTA बटन, सबसे अधिक नोटा वोट इस सीट पर डाले गए

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Bihar Election Result 2025: बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2025) में नोटा (उपरोक्त में से कोई नहीं) एक बार फिर से सुर्खियों में है, जहां इस विकल्प को मिले वोट कई सीट पर निर्णायक साबित हुए। राज्य की 26 विधानसभा सीट पर नोटा (NOTA) को मिले वोट हार-जीत के अंतर से अधिक रहे, जिससे चुनाव के नतीजों पर इसका सीधा असर पड़ा है।

निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2020 के विधानसभा चुनाव में 7,06,293 मतदाताओं ने नोटा का विकल्प चुना था जबकि 2025 में यह संख्या बढ़कर 9,10,710 हो गई। हालांकि यह आंकड़ा वर्ष 2015 के मुकाबले कम है, जब 9,47,279 मतदाताओं ने नोटा का बटन दबाया था। सबसे अधिक 8,634 नोटा वोट कल्याणपुर सीट पर डाले गए। इसके अलावा गड़खा, कुशेश्वरस्थान, मधुबन और खगड़िया जैसी सीट पर भी नोटा के वोट ने नतीजों की दिशा बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वहीं, 26 सीट पर नोटा को मिले वोट हार-जीत के अंतर से अधिक होने के कारण राजनीतिक दलों और रणनीतिकारों को अपनी चुनावी रणनीति पर पुनर्विचार करने को मजबूर होना पड़ा है।

जनता उम्मीदवारों के चयन को लेकर असंतुष्ट
राजनीतिक विश्लेषक सुभाष पांडे ने कहा कि मतदाताओं के बीच नोटा का बढ़ता चलन इस बात का स्पष्ट संकेत है कि जनता उम्मीदवारों के चयन को लेकर असंतुष्ट है। उन्होंने कहा, ‘‘नोटा के बढ़ते वोट राजनीतिक दलों को एक सशक्त संदेश देते हैं। कई सीट पर नोटा ने चुनावी समीकरण बिगाड़े हैं, जिससे पार्टियों की चिंता बढ़ गई है।” बिहार में नोटा का उभरता रुझान यह दर्शाता है कि मतदाता विकल्प की तलाश में हैं और राजनीतिक दलों को उम्मीदवार चयन तथा स्थानीय मुद्दों पर अधिक गंभीरता से काम करने की आवश्यकता है।

कांग्रेस का यह तथाकथित ‘टैलेंट हंट’ कार्यक्रम असल में ‘डैमेज कंट्रोल हंट’ है: प्रतुल शाहदेव

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Ranchi News: झारखंड भाजपा प्रदेश प्रवक्ता प्रतुल शाहदेव ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष केशव महतो कमलेश और राष्ट्रीय प्रवक्ता अतुल लोंढे पाटिल के प्रेस वार्ता पर पलटवार करते हुए कहा कि कांग्रेस बिहार में सिंगल डिजिट सीटों के आंकड़े पर सिमट गई है। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अब इस मुद्दे पर डैमेज कंट्रोल करने के लिए नया पोस्टर और नया प्रवक्ता पैनल का नाटक कर रही है।

“पूरी दुनिया जानती है कि PM मोदी के विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता है”
प्रतुल शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस झारखंड में अपनी संगठनात्मक क्षमता को छुपाने के लिए नए-नए पोस्टर और कार्यक्रम लॉन्च कर रही है, लेकिन जनता सब जानती है कि जिस पार्टी में शीर्ष नेताओं की ही विश्वसनीयता शून्य है, वहां प्रवक्ता बदलने से कुछ नहीं बदलेगा। शाहदेव ने कहा कि इस सीरियस प्रेस कॉन्फ्रेंस को कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता ने उस समय लाफ्टर शो बना दिया, जब उन्होंने कहा कि यथार्थ में और सोशल मीडिया में राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से बहुत ज्यादा लोकप्रिय है। शाहदेव ने कहा कि पूरी दुनिया जानती है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विश्व के सबसे लोकप्रिय नेता है। देश की बात छोड़िए विदेश में भी उनकी कोई टक्कर का दूसरा नेता नहीं है। फिर उनकी तुलना तीन-तीन आम चुनाव में बुरे तरीके से हारने वाले कांग्रेस पार्टी के अगुवाई करने वाले राहुल गांधी जी से कैसे हो सकती है? शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस जिस टैलेंट हंट की बात कर रही है, वह सिर्फ एक नया राजनीतिक शो-ऑफ है, क्योंकि सबसे पहले कांग्रेस को अपने शीर्ष नेतृत्व में ‘वैचारिक निष्ठा’ ढूंढनी चाहिए, जो रोज दल बदलने वाले, टिकट बेचने वाले और परिवारवाद से ऊपर नहीं उठ पाए हैं।

“कांग्रेस के नेता देश और संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन…”
प्रतुल शाहदेव ने कहा कि कांग्रेस जिस ‘स्पष्ट सोच’ की मांग कर रही है, वही सोच उसकी अपनी नीतियों से गायब है। कांग्रेस के नेता देश और संविधान की दुहाई देते हैं, लेकिन झारखंड में भ्रष्टाचार और लूट की राजनीति की सबसे बड़ी साझेदार वही पार्टी रही है। 140 करोड़ आबादी वाले देश में कांग्रेस को 200 करोड लोगों की प्रतिक्रियाएं मिलना हास्यास्पद, लगता है पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी प्रतिक्रिया मिल रही है। शाहदेव ने कहा 140 करोड़ की आबादी वाले देश में कांग्रेस को 200 करोड लोगों की प्रतिक्रिया मिलने का दावा ही सारे अभियान की पोल खोलता है। कांग्रेस के प्रवक्ता का यह कहना कि उन्हें 200 करोड लोगों ने प्रतिक्रियाएं दी हैं हास्यास्पद है। इसी से प्रतीत होता है कि उनको अब पाकिस्तान और बांग्लादेश से भी प्रतिक्रिया मिल रही है। बात जमीन की हो या सोशल मीडिया की हो भाजपा और कांग्रेस में कोई मुकाबला ही नहीं है।

मक्का से मदीना जा रहे उमरा यात्रियों की बस का भयानक एक्सीडेंट, 42 की मौत- देखें दिल दहला देने वाला दृश्य

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नेशनल डेस्क: एक धार्मिक यात्रा उमरा पर जा रहे भारतीय यात्रियों के लिए सोमवार सुबह मौत और दर्द लेकर आई। मक्का से मदीना जा रही एक बस सऊदी अरब में डीज़ल टैंकर से टकरा गई, जिससे आग भड़क उठी और बस पूरी तरह जलकर खाक हो गई। मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक इस दर्दनाक हादसे में कम से कम 42 लोगों की मौत की आशंका जताई जा रही है।

बहुत से यात्री सो रहे थे, बचने का मौका नहीं मिला
हादसा मुहरास/मुफ़रीहत के पास हुआ, जो मदीना से लगभग 160 किलोमीटर दूर है। दुर्घटना की समय सुबह लगभग 1:30 बजे थी, जब अधिकांश यात्री गहरी नींद में थे। आग लगने के तुरंत बाद कई यात्रियों के पास बाहर निकलने का कोई मौका नहीं था। रेस्क्यू टीमों ने बताया कि बस पूरी तरह से जल गई और मृतकों की पहचान करना बेहद कठिन हो गया है। एक व्यक्ति के बचने की संभावना है, लेकिन उनकी स्थिति अभी साफ नहीं है।

पैसेंजर्स में महिलाओं और बच्चों की संख्या चिंताजनक
अभी तक मिली जानकारी के अनुसार, मृतकों में अधिकांश महिलाएं और बच्चे हो सकते हैं। कुछ अनौपचारिक सूत्रों के मुताबिक, लगभग 11 महिलाएं और 10 बच्चे इस हादसे में शामिल हैं। भारतीय और सऊदी अधिकारियों की ओर से मृतकों की संख्या और पहचान की पुष्टि की जा रही है।

सऊदी और भारतीय अधिकारियों ने राहत कार्य शुरू किया
सऊदी सिविल डिफ़ेंस और पुलिस मौके पर तुरंत पहुंची, जबकि भारतीय अधिकारियों और उमरा एजेंसी के प्रतिनिधियों ने राहत और सूचना समन्वय के लिए मदद शुरू की। यात्रियों के परिवार हाइदराबाद समेत विभिन्न शहरों में बेचैनी के साथ अपडेट का इंतजार कर रहे हैं।

तेलंगाना सरकार ने की तुरंत कार्रवाई
तेलंगाना के मुख्यमंत्री ए. रेवंथ रेड्डी ने हादसे पर गहरा शोक व्यक्त किया। उन्होंने राज्य के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को निर्देश दिए कि वे तुरंत सभी विवरण जुटाएं, प्रभावित लोगों की संख्या निर्धारित करें और केंद्र सरकार व सऊदी दूतावास के साथ समन्वय करें। मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि आवश्यकता पड़ने पर तुरंत राहत कार्य सुनिश्चित किया जाए।

परिवारों के लिए दर्दनाक इंतजार
यह हादसा उन परिवारों के लिए आश्चर्य और चिंता का कारण बन गया है, जो अपने प्रियजनों की सुरक्षित यात्रा की कामना कर रहे थे। मक्का से शुरू हुई पवित्र यात्रा अब अनिश्चितता और दुःख में बदल गई है।

UP: सरकार और विद्युत नियामक आयोग से उपभोक्ताओं के बिजली बिल में वृद्धि से राहत देने की मांग

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UPPCL News: : परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने रविवार को कहा कि उपभोक्ताओं के सरप्लस के आधार पर अगले पांच वर्षों तक बिजली दरों में कम से कम आठ प्रतिशत की कटौती की जाए, क्योंकि एक साथ 40 प्रतिशत की बिजली दरों में कमी पावर कारपोरेशन वहन नहीं कर पाएगा।

लखनऊ: उत्तर प्रदेश राज्य विद्युत उपभोक्ता परिषद ने सरकार और विद्युत नियामक आयोग से बिजली बिल में वृद्धि से राहत देने की मांग की है।

परिषद का कहना है कि उपभोक्ताओं का बिजली कंपनियों पर 33,122 करोड़ रुपये अधिक (सरप्लस) निकल रहा है। ऐसे में बिजली दरें बढ़ाने का कोई औचित्य नहीं है। इस वर्ष भी कंपनियों पर चार हजार करोड़ रुपये से ऊपर अधिक निकलना तय है।

कानून के तहत प्रदेश में बिजली दरों में बढ़ोतरी नहीं हो सकती परिषद के अध्यक्ष और राज्य सलाहकार समिति के सदस्य अवधेश कुमार वर्मा ने रविवार को कहा कि उपभोक्ताओं के सरप्लस के आधार पर अगले पांच वर्षों तक बिजली दरों में कम से कम आठ प्रतिशत की कटौती की जाए, क्योंकि एक साथ 40 प्रतिशत की बिजली दरों में कमी पावर कारपोरेशन वहन नहीं कर पाएगा।

69000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण विवाद गहराया, सुप्रीम कोर्ट सुनवाई से पहले अभ्यर्थियों ने याची लाभ देने की मांग दोहराई

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69000 शिक्षक भर्ती में आरक्षण को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर है। सुप्रीम कोर्ट में 18 नवंबर को होने वाली अहम सुनवाई से हजारों अभ्यर्थियों को बड़ी उम्मीदें हैं। आरक्षण प्रभावित उम्मीदवार सरकार से याची लाभ दिए जाने की मांग कर रहे हैं, ताकि मामला शांतिपूर्ण तरीके से निस्तारित हो सके।

69000 Bharti Latest News: उत्तर प्रदेश की बहुचर्चित 69000 सहायक अध्यापक भर्ती एक बार फिर सुर्खियों में है। आरक्षण को लेकर वर्षों से चल रहा विवाद अब निर्णायक मोड़ पर पहुँच चुका है। सुप्रीम कोर्ट में 18 नवंबर को होने वाली महत्वपूर्ण सुनवाई को लेकर आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों में भारी उम्मीद और बेचैनी दोनों देखी जा रही हैं। अभ्यर्थियों ने प्रदेश सरकार से मांग की है कि अदालत में “याची लाभ” देने का प्रस्ताव प्रस्तुत किया जाए, जिससे इस लंबे विवाद का समाधान निकले और किसी भी अभ्यर्थी को इस भर्ती से बाहर न किया जाए।

आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों ने शासन और विभागीय प्रमुख अधिकारियों को मेल भेजकर साफ कहा है कि इस मामले में सरकार यदि सकारात्मक रुख अपनाए, तो यह विवाद बिना किसी बड़े नुकसान के सुलझ सकता है। उनका कहना है कि किसी भी चयनित अभ्यर्थी का चयन रद्द किए बिना, प्रभावित अभ्यर्थियों को याची लाभ देकर न्यायिक समाधान संभव है।

लंबे समय से अटका विवाद, अब निर्णायक क्षण

69000 शिक्षक भर्ती परीक्षा 2019 से ही विवादों के घेरे में रही है। मेरिट निर्धारण, कट ऑफ, आरक्षण मानक, जिला आवंटन समेत कई बिंदुओं पर अभ्यर्थियों के बीच असंतोष बना रहा। विशेषकर आरक्षण से संबंधित गलतियों को लेकर दर्जनों याचिकाए विभिन्न अदालतों में दाखिल हुईं।

आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों का कहना है कि भर्ती प्रक्रिया में आरक्षण का सही अनुपालन नहीं किया गया, जिससे कई पात्र अभ्यर्थी चयन सूची से बाहर रह गए। मामले की गंभीरता को देखते हुए अब सुप्रीम कोर्ट इसका अंतिम समाधान करेगा। 18 नवंबर की सुनवाई इसलिए अत्यंत अहम मानी जा रही है क्योंकि इस दिन अदालत सरकार के रुख और याचिकाकर्ताओं की दलीलों के आधार पर आगे की दिशा तय कर सकती है।

अभ्यर्थियों की मांग – ‘याची लाभ ही विवाद का शांतिपूर्ण समाधान’

आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों का प्रमुख अनुरोध यह है कि किसी भी चयनित अभ्यर्थी को भर्ती से बाहर न किया जाए। आरक्षण प्रभावित अभ्यर्थियों को याची लाभ प्रदान किया जाए। सरकार सुप्रीम कोर्ट में इस दिशा में सकारात्मक प्रस्ताव पेश करें। लंबित मामला जल्द निपटे ताकि वर्षों से रुका भविष्य आगे बढ़ सके। अभ्यर्थियों का कहना है कि वे केवल न्याय चाहते हैं, किसी को हटाने या नुकसान पहुँचाने की मांग नहीं कर रहे। उनका मानना है कि याची लाभ (benefit to the petitioners) प्रदान करके सरकार और न्यायालय दोनों एक संतुलित समाधान निकाल सकते हैं।

अभ्यर्थियों का प्रतिनिधिमंडल राज्य मंत्री से मिला

पिछड़ा दलित संयुक्त मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष सुशील कश्यप और प्रदेश संरक्षक भास्कर सिंह ने बताया कि हाल ही में अभ्यर्थियों का एक प्रतिनिधिमंडल बेसिक शिक्षा राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) संदीप सिंह से मिला था। मुलाकात के दौरान अभ्यर्थियों ने मंत्री को अपनी स्थिति विस्तार से बताई और उनसे आग्रह किया कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष में ठोस और न्यायोचित रुख अपनाए। मंत्री संदीप सिंह ने आश्वासन दिया कि सरकारी अधिवक्ता 18 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट में उपस्थित रहेंगे। सरकार अभ्यर्थियों की मांग और न्यायिक स्थिति को ध्यान में रखते हुए सर्वोत्तम समाधान की दिशा में कदम उठाएगी। यह आश्वासन अभ्यर्थियों को कुछ राहत देता है, पर वे अंतिम निर्णय के लिए अब भी अदालत की प्रतीक्षा में हैं।

18 नवंबर की सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण है

इस सुनवाई का महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि यह मामला पाँच वर्षों से अटका हुआ है। हजारों अभ्यर्थियों का भविष्य इससे जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट का निर्णय भर्ती की अंतिम स्थिति तय करेगा। चयन सूची और नियुक्तियों पर इसका सीधा प्रभाव पड़ेगा। राज्य सरकार को अपने पक्ष और इरादे स्पष्ट करने होंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि कोर्ट अगर याची लाभ या समानुपातिक समाधान की बात स्वीकार करता है, तो यह भविष्य में होने वाली सभी बड़ी भर्तियों के लिए भी मिसाल बनेगा।

अभ्यर्थियों की बेबसी-नौकरी इंतजार में, उम्र निकल रही

अनेकों अभ्यर्थी लगातार कह रहे हैं कि भर्ती की देरी से उनकी उम्र निकलती जा रही है। कई अभ्यर्थियों ने वर्षों तक तैयारी की लेकिन विवादों के कारण नियुक्तिया रुकने से वे मानसिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से दबाव में आ चुके हैं। हमने 2019 में फॉर्म भरा था। अब 2025 आ गया है। नौकरी नहीं मिली, ऊपर से उम्र भी समाप्ति के कगार पर है,यह भावना लगभग सभी प्रभावित अभ्यर्थियों में देखने को मिलती है। कई उम्मीदवार आज भी कोर्ट-कचहरी, विभागीय कार्यालयों और जनप्रतिनिधियों के बीच दौड़ते दिखाई देते हैं।

शासन की चुप्पी और अभ्यर्थियों की बेचैनी

हालांकि सरकार की ओर से कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं हुआ है, लेकिन विभागीय सूत्र बताते हैं कि इस बार सरकार विवाद का स्थायी समाधान चाहती है। भर्ती विवादों के कारण शासन की छवि भी प्रभावित होती है और सरकार चाहती है कि बहुप्रतीक्षित शिक्षक भर्ती मुद्दा अब शांत हो जाए। अभ्यर्थियों की सबसे बड़ी चिंता यह है कि सरकार कहीं तटस्थ रुख न अपनाए। इसलिए वे बार-बार ईमेल, ज्ञापन, और जनप्रतिनिधियों से मुलाकात कर अपनी आवाज़ सरकार तक पहुँचा रहे हैं।

समाधान की संभावनाएँ

यदि सुप्रीम कोर्ट यह मान ले कि किसी चयनित शिक्षक को हटाए बिना,प्रभावित अभ्यर्थियों को याची लाभ प्रदान करके,भर्ती को नियमित किया जा सकता है, तो यह सभी पक्षों के लिए लाभकारी होगा।

ऐसा होने पर

  • चयनित शिक्षक अपनी नौकरी पर बने रहेंगे
  • आरक्षण प्रभावित दावेदारों को न्याय मिलेगा
  • वर्षों से लंबित प्रक्रिया पूरी होगी
  • शिक्षा विभाग में स्थिरता आएगी

अगली सुबह का इंतज़ार-सुनवाई से बड़ी उम्मीदें

अब लाखों अभ्यर्थी सिर्फ 18 नवंबर का इंतजार कर रहे हैं। यह तारीख उनके जीवन में राहत और उम्मीद की नई किरण ला सकती है, विवाद को और लंबा भी खींच सकती है। लेकिन सभी की इच्छा यही है कि अदालत और सरकार मिलकर ऐसा रास्ता निकालें जिससे न्याय और व्यवस्था दोनों सुरक्षित रहें।

Auraiya News: फिर टूटा ट्रक का एक्सल, कंचौसी में सात घंटे जाम

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कंचौसी। कंचौसी रेलवे क्राॅसिंग पर शनिवार की रात तेज गति से गुजर रहे ट्रक का एक्सल टूटने से कस्बे में सात घंटे तक जाम लगा रहा। दोनों छोर दो-दो किमी तक वाहन खड़े हो गए। सूचना पर पहुंची पुलिस को जाम खुलवाने में मशक्कत करनी पड़ी। रविवार सुबह नौ बजे जाम खुलने पर क्रॉसिंग पर वाहनों की कतार लगने से आनंद विहार एक्सप्रेस व दो मालगाड़ियों को आउटर पर रोकना पड़ा।शनिवार रात करीब दो बजे एक ट्रक तेज गति से निकल रहा था । इसी दौरान वह क्राॅसिंग के एक बड़े गड्ढे में फंस गया। इससे उसका एक्सल टूट गया और आवागमन प्रभावित हो गया। रविवार सुबह तक दो किमी से अधिक लंबा जाम लग गया। लोग जाम में फंसकर परेशान होते रहे। चौकी पुलिस ने मशक्कत के बाद सुबह करीब 9 बजे जाम खुलवाया। जाम खुलने के बाद जैसे ही क्राॅसिंग को खोला गया तो ट्रैक पर वाहनों की कतार लग गई। इससे आनंद विहार एक्सप्रेस व डीएफसी ट्रैक पर आ रही दो मालगाड़ियों को आउटर पर रोका गया।

सुबह 10 बजे के करीब डीएफसी ट्रैक पर कानपुर की ओर जा रही मालगाड़ी सिग्नल न मिलने से क्राॅसिंग और रेलवे स्टेशन के बीच करीब बीस मिनट तक खड़ी रही। इससे फिर सड़क के दोनों ओर वाहनों की लंबी कतारें लग गईं। मालगाड़ी जाने के बाद क्राॅसिंग खुल सकी और तब यातायात बहाल हो सका। इस संबंध स्टेशन अधीक्षक दरबारी कुमार ने बताया ट्रक का एक्सल टूटने से जाम की स्थिति बनी थी। कंचौसी-रसूलाबाद मार्ग पर आए दिन जाम की स्थिति भयानक होती जा रही है। चार दिन पहले भी कॉसिंग के पास एक ट्रक का एक्सल टूटने से पांच घंटे तक जाम लगा रहा था। स्थानीय लोगों व राहगीरों का कहना है कि जब तक ओवरब्रिज की व्यवस्था नहीं होती, तब तक कस्बे को जाम से निजात मिलना मुश्किल है।

Auraiya News: सीओ ने खुलवाया जाम, 30 वाहनों के चालान काटे

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बिधूना। कस्बे में रविवार सुबह से बाजार बाजार की सड़क पर लगा जाम खुलवाने के लिए सीओ बिधूना पी. पुनीत मिश्रा सड़क पर उतरे। जाम खुलवाते हुए उन्होंने सड़क पर खड़े 30 वाहनों का चालान काटा। कार्रवाई की सूचना मिलते ही व्यापारियों और वाहन स्वामियों में खलबली मच गई। कई लोग अपने वाहन हटाकर मौके से निकल गए।सहालग के चलते बाजार में अधिक भीड़ होने पर वाहन स्वामियों ने मनमाने तरीके से सड़कों पर वाहन खड़े कर दिए। इससे दुर्गा मंदिर तिराहा, लोहा मंडी रोड, फीडर रोड, महिला मार्केट में जाम लग गया। लोगों ने बताया कि यहां कपड़ा और रेडीमेड दुकानों के साथ-साथ एसबीआई बैंक होने के कारण वाहनों की संख्या अधिक रहती है। दुकानदारों के फुटपाथ पर सामान रखने और ग्राहकों के सड़क पर बाइक, स्कूटी और चार पहिया वाहन खड़े कर देने से सड़क संकरी हो जाती है जिससे रोजाना जाम की स्थिति बनती है।

नगर पंचायत अध्यक्ष आदर्श कुमार मिश्रा ने बताया कि जल्द ही नगर पंचायत और प्रशासनिक अधिकारियों के सहयोग से कस्बे में अतिक्रमण हटाओ अभियान चलाया जाएगा। दुकानदारों को मानक के भीतर ही व्यापार करने व सड़क खाली छोड़ने के निर्देश दिए जाएंगे। (संवाद)

बिहार चुनाव में महज एक सीट जीतने पर गदगद हुईं मायावती, बोलीं- ‘विरोधियों की रणनीति हो गई फेल’

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लखनऊ। बिहार विधानसभा चुनाव में कैमूर जिले की रामगढ़ सीट पर बसपा उम्मीदवार सतीश कुमार सिंह यादव की जीत को पार्टी सुप्रीमो मायावती ने विरोधियों की पूरी कोशिशों पर कार्यकर्ताओं की मेहनत की जीत बताया है।

उन्होंने आरोप लगाया कि वोटों की गिनती बार-बार करवाने के बहाने प्रशासन और सभी विरोधी दल एकजुट होकर बसपा उम्मीदवार को हराने में जुटे थे, लेकिन बसपा के जुझारू कार्यकर्ता अंत तक डटे रहे और विरोधियों की रणनीति नाकाम हो गई।

मायावती ने पार्टी पदाधिकारियों, कार्यकर्ताओं और समर्थकों को इस जीत के लिए दिल से धन्यवाद दिया। कहा कि यह जीत संगठन की मजबूती और जमीनी मेहनत का परिणाम है।

उन्होंने यह भी बताया कि रामगढ़ के अलावा आसपास की अन्य सीटों पर भी बसपा उम्मीदवारों ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन जीत हासिल नहीं कर सके। फीडबैक के अनुसार, यदि चुनाव निष्पक्ष होते तो बसपा कई और सीटें जीत सकती थी।

दिल्ली में प्रदूषण का कहर: कम उम्र में मौत और मंदबुद्धि रहने का खतरा

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नेशनल डेस्क: दिल्ली में प्रदूषण का स्तर इतना खराब हो चुका है कि यहां के बच्चे आसमान का रंग ‘राख’ जैसा देखकर जाग रहे हैं। उनकी क्रेयॉन बॉक्स में भले ही ‘स्काई ब्लू’ रंग हो, लेकिन उन्हें यह नहीं पता कि नीला आसमान कैसा दिखता है। दिल्ली-एनसीआर में, बच्चे केवल बड़े नहीं हो रहे हैं वे सांस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। जिस हवा से उन्हें जीना, सीखना और खेलना चाहिए, वही हवा उनका जीवन छोटा कर रही है।

विशेषज्ञों ने निष्कर्ष निकाला है कि दिल्ली में पैदा हुए और रह रहे Gen Alpha (1990 के दशक के अंत और 2010 के शुरुआती वर्षों में जन्मे युवा) के बच्चे, केवल सांस लेने के कारण, जल्दी मर सकते हैं, कम बुद्धिमान हो सकते हैं, अधिक बीमार पड़ सकते हैं और स्कूल में खराब प्रदर्शन कर सकते हैं। आइए जानते हैं कैसे। ये वे गंभीर चेतावनियाँ हैं जो डॉक्टर 2017 से लगातार दे रहे हैं और इंडिया टुडे उन्हें निरंतर रिपोर्ट कर रहा है:

1. कम उम्र में मृत्यु
वैज्ञानिक प्रमाण लंबे समय से दिखाते रहे हैं कि सूक्ष्म कण पदार्थ (PM 2.5) के संपर्क में रहने से बच्चों में समय से पहले मौत का खतरा बढ़ जाता है, खासकर निचले श्वसन संक्रमण और निमोनिया से। दक्षिण एशिया और उप-सहारा अफ्रीका में किए गए मेटा-विश्लेषण इस बात की पुष्टि करते हैं कि शिशु और पाँच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर सीधे परिवेशी वायु प्रदूषण से जुड़ी हुई है।

चौंकाने वाला आंकड़ा: अगर आप पाँच साल पहले दिल्ली में पैदा हुए थे, तो आपने पहले ही 826 दिन ‘खराब’ या उससे भी बदतर हवा में बिता दिए हैं जो आपके जीवन का लगभग आधा हिस्सा है। इनमें से 81 दिन तो हवा की गुणवत्ता ‘अति गंभीर’ थी।

CSE की चेतावनी (2019): सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट ने 2019 में ही चेतावनी दी थी कि “वायु प्रदूषण एक राष्ट्रीय आपातकाल बन गया है, जो भारत में हर साल पाँच साल से कम उम्र के एक लाख बच्चों को मार रहा है।” डॉक्टर वास्तविक समय में रुके हुए फेफड़े, सूजन वाले वायुमार्ग, निमोनिया के उच्च जोखिम और समय से पहले मौत के रूप में इसे देख रहे हैं। हर साल हम कहते हैं, “कुछ करना चाहिए।” और हर सर्दी में, हम कुछ नहीं करते।

2. कम बुद्धिमान
अब यह स्पष्ट प्रमाण है कि गंदी हवा मस्तिष्क के विकास को नुकसान पहुँचाती है। बचपन में PM 2.5 और NO2 के दीर्घकालिक संपर्क को मस्तिष्क में संरचनात्मक परिवर्तनों और मापने योग्य संज्ञानात्मक गिरावट से जोड़ा गया है। यहाँ तक कि जन्म से पहले का प्रदूषण भी बाद में IQ स्कोर और मेमोरी फंक्शन को कम कर सकता है।

नवीनतम शोध (2024): इंडिया टुडे द्वारा कवर किए गए 2024 के एक अमेरिकी अध्ययन में पाया गया कि लंबे समय तक प्रदूषित हवा के संपर्क में रहने से बच्चों की सीखने की क्षमता, याददाश्त और ध्यान केंद्रित करने की अवधि बाधित हो सकती है।

यूनिसेफ की चेतावनी (2017): 2017 में यूनिसेफ ने चेतावनी दी थी कि “1.7 करोड़ बच्चे उन क्षेत्रों में रहते हैं जहाँ वायु प्रदूषण वैश्विक सीमा से छह गुना अधिक है, जिससे उनके मस्तिष्क के विकास पर खतरा हो सकता है।” हम जानते थे कि धुंध हमारे बच्चों की क्षमता को खा रही है। फिर भी हमने उन्हें इसे साँस लेने दिया।

3. अधिक बीमार
चिकित्सा अनुसंधान ने दिखाया है कि PM 2.5  में प्रत्येक 10μg/m 3 की वृद्धि के साथ बच्चों में अस्थमा, ब्रोंकाइटिस और निमोनिया के लिए अस्पताल के दौरे में महत्वपूर्ण वृद्धि होती है। चूँकि बच्चे तेजी से साँस लेते हैं और उनके वायुमार्ग छोटे होते हैं, प्रदूषक अधिक गहराई तक प्रवेश करते हैं और अधिक सूजन पैदा करते हैं। अस्पतालों का हाल: दिल्ली के अस्पताल बाल चिकित्सा संकट वार्ड में बदल गए हैं। प्रतीक्षा कक्ष खाँसते हुए बच्चों से भरे रहते हैं, जो धुंध में साँस लेने के लिए संघर्ष कर रहे हैं।

डॉक्टर की राय (2019): डॉ. विवेक नांगिया ने 2019 में कहा था, “बच्चों पर अब 5-7 दिन की दवाओं का असर नहीं हो रहा है। अब न्यूनतम दो सप्ताह के कोर्स की आवश्यकता है। एक साल तक के बच्चे श्वसन समस्याओं के साथ आ रहे हैं।” ताज़ा अपडेट (2025): AIIMS के डॉक्टरों ने रिपोर्ट किया है कि जब भी हवा की गुणवत्ता गिरती है, श्वसन मामलों में 15-20 प्रतिशत की वृद्धि होती है। हम एक ऐसी पीढ़ी पाल रहे हैं जिसकी सर्दी की पहली याद इन्हेलर की आवाज़ है, न कि कोहरा।

4. स्कूल में खराब प्रदर्शन
बड़े पैमाने के अध्ययनों में पाया गया है कि दीर्घकालिक वायु प्रदूषण जोखिम से स्कूल के टेस्ट स्कोर और संज्ञानात्मक प्रदर्शन में कमी आती है। यहाँ तक कि परीक्षा के दिनों में PM 2.5 में थोड़ी सी वृद्धि भी छात्र के प्रदर्शन में मापने योग्य गिरावट से जुड़ी होती है। शिक्षकों का अनुभव: पूर्वी दिल्ली की एक शिक्षिका ने बताया कि उनके आधे छात्र सुबह की प्रार्थना खाँसते हुए शुरू करते हैं।

एक बच्चा गुणन कैसे सीख सकता है जब वह अपनी साँसें गिन रहा हो? गुरुग्राम, नोएडा, लखनऊ, कानपुर सभी जगह ‘बहुत खराब से गंभीर’ AQI स्तर की रिपोर्ट आ रही है। इस साल, दुनिया के 15 सबसे प्रदूषित शहरों में से 10 भारत में थे। यह दिल्ली का संकट नहीं है। यह एक राष्ट्रीय आपातकाल है, जिसका केंद्र हमारे खेल के मैदान हैं।

प्रदूषण पर बहानों से नहीं चलेगा काम
लगभग एक दशक से, डॉक्टर, वैज्ञानिक और माता-पिता कार्रवाई की गुहार लगा रहे हैं। इसके बजाय, हमने इस धुंध को ‘सामान्य’ बना दिया है। हमने अपने बच्चों को सिखाया है कि यह “बस धुंध का मौसम है।” स्वच्छ हवा विलासिता नहीं है। यह एक मौलिक अधिकार है।

भारत पर लगाए टैरिफ पर ट्रंप का यू-र्टन, अब इन भारतीय कारोबारियों को मिलेगा फायदा

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नेशनल डेस्क: सत्ता में आने के बाद दुनिया पर अपना दबदबा दिखाने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के सुर अब noticeably बदल रहे हैं। “मेक अमेरिका ग्रेट अगेन” का नारा देते हुए जो आर्थिक शक्ति का दावा किया गया था, वह अब देश में मंडरा रहे मंदी के संकट के सामने कमजोर पड़ता दिखाई दे रहा है। इसी दबाव के बीच ट्रंप प्रशासन ने कृषि और खाद्य उत्पादों पर लगाए गए टैरिफ में भारी कटौती का ऐलान कर दिया है- जिसका सीधा लाभ भारतीय मसाला कारोबारियों और चाय उत्पादकों को मिलने की उम्मीद है।

अमेरिका ने करीब 200 कृषि, खाद्य और खेती से जुड़े उत्पादों पर आयात शुल्क कम किया है। नई सूची में काली मिर्च, लौंग, जीरा, इलायची, अदरक, हल्दी, काजू, आम से बने उत्पाद और चाय की कई किस्में शामिल हैं। 2024 में भारत ने अमेरिका को 50 करोड़ डॉलर से अधिक मसाले और करीब 8.3 करोड़ डॉलर की चाय-कॉफी भेजी थी। अमेरिका द्वारा खरीदे गए कुल काजू में लगभग 20% भारत से गया था।

किन उत्पादों को राहत नहीं?

टैरिफ कटौती के बावजूद भारत के कई प्रमुख निर्यात इससे बाहर रखे गए हैं।

झींगा, समुद्री उत्पाद, बासमती चावल, भारतीय रत्न व आभूषण, कपड़ा उत्पाद (इन पर अब भी 50% शुल्क)। अमेरिका का तर्क है कि बड़ा व्यापार समझौता तभी आगे बढ़ेगा जब भारत रूसी तेल की खरीद में कटौती कर अमेरिकी ऊर्जा पर निर्भरता बढ़ाए।

491 मिलियन डॉलर तक का फायदा!

भारतीय अधिकारियों के मुताबिक, लगभग 50 तरह के प्रोसेस्ड फूड- जिनका पिछले वर्ष का निर्यात 491 मिलियन डॉलर था- इस कटौती के बड़े लाभार्थी होंगे। इनमें कॉफी-चाय के अर्क, फलों के रस, कोको उत्पाद, आम से बनी वस्तुएं और प्लांट वैक्स शामिल हैं। इसके साथ ही 359 मिलियन डॉलर के मसाले भी राहत पाने वालों में हैं।

फलों और मेवों की लगभग 48 किस्में- नारियल, अमरूद, आम, काजू, केला, सुपारी और अनानास- भी फायदा उठाएंगी, भले ही इनका कुल निर्यात केवल 55 मिलियन डॉलर था। नई सूची भारत के कुल 5.7 बिलियन डॉलर के कृषि निर्यात का लगभग 20% और देश के 86 बिलियन डॉलर के कुल वस्तु निर्यात का 40% हिस्से को प्रभावित करती है।

अमेरिका में बढ़ती महंगाई- ट्रंप पर बढ़ा दबाव

विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम राजनीतिक दबाव का नतीजा है। अमेरिका में महंगाई लगातार बढ़ रही है, और हाल ही के उपचुनावों में रिपब्लिकनों को मिली हार के बाद ट्रंप प्रशासन पर कड़ा संदेश देने का दबाव बढ़ गया था। ट्रंप ने जनता के गुस्से को शांत करने के लिए 2,000 डॉलर के राहत चेक और मांस प्रोसेसिंग उद्योग की जांच का भी ऐलान किया है।

हालांकि ट्रंप का दावा है कि उनके टैरिफ नियमों ने घरेलू खर्च नहीं बढ़ाया, लेकिन उद्योग समूहों और अर्थशास्त्रियों ने शुल्क कम करने के फैसले की सराहना की है। दूसरी ओर आलोचक इस बात पर कटाक्ष कर रहे हैं कि जब आम अमेरिकी महंगाई से जूझ रहा है, तब राष्ट्रपति ने मार-ए-लागो में गैट्सबी थीम वाली आलीशान पार्टी रखी और व्हाइट हाउस से भी बड़ा बॉलरूम बनवाने की तैयारी की।