यदि यह कहावत ‘भूगोल ही भाग्य है’ सच साबित होती है, तो साइप्रस इसका सबसे सटीक उदाहरण है। चाहे यूनानी, फारसी, रोमन, ओटोमन हों या ब्रिटिश, छोटा सा साइप्रस कई लोगों के लिए अनमोल संपत्ति रहा है। कारण यह है कि यह दुनिया के सबसे पुराने संघर्ष-प्रधान क्षेत्रों में से एक के पास मौजूद है और हाल ही में इसके विशाल ऊर्जा संसाधनों के कारण भी।
हमले पर क्या बोले ब्रिटिश पीएम?
यह हमला इसलिए अहम है क्योंकि 1974 में तुर्की के हमले के बाद पहली बार किसी तीसरे देश ने साइप्रस की जमीन पर हमला किया है। इससे साफ संकेत मिलता है कि ईरान और अमेरिका-इस्राइल के बीच का संघर्ष अब नए इलाकों तक फैल रहा है। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीएर स्टार्मर की सरकार ने कहा कि यह हमला उस फैसले का नतीजा नहीं है, जिसमें ब्रिटेन ने अमेरिका को अपने अड्डों के इस्तेमाल की अनुमति दी थी। हालांकि माना जा रहा है कि अगर ईरान या उसका सहयोगी संगठन हिजबुल्ला ब्रिटेन को संदेश देना चाहते हैं, तो साइप्रस का अकरोटिरी बेस उनके लिए आसान निशाना है, क्योंकि यह मध्य-पूर्व से काफी नजदीक है।
हम किसी सैन्य कार्रवाई का हिस्सा नहीं- क्रिस्टोडौलाइड्स
साइप्रस के राष्ट्रपति निकोस क्रिस्टोडौलाइड्स ने साफ कहा है कि उनका देश किसी सैन्य कार्रवाई में हिस्सा नहीं ले रहा है और न ही लेगा। लेकिन जमीन पर मौजूद ब्रिटिश अड्डों की वजह से साइप्रस सीधे खतरे में आ गया है। सुरक्षा बढ़ाने के लिए ग्रीस ने चार एफ-16 लड़ाकू विमान और दो युद्धपोत भेजे हैं। फ्रांस भी अपना युद्धपोत और एंटी-ड्रोन सिस्टम भेज रहा है। जर्मनी और ब्रिटेन ने भी अतिरिक्त सैन्य सहायता देने की घोषणा की है।
भौगोलिक स्थिति साइप्रस की बड़ी ताकत भी और कमजोरी भी
साइप्रस पहले खुद को तटस्थ रखने की कोशिश करता था, लेकिन यूरोपीय संघ की सदस्यता और मौजूदा सरकार की पश्चिम समर्थक नीति के बाद वह खुलकर पश्चिमी देशों के साथ खड़ा दिख रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि साइप्रस की भौगोलिक स्थिति ही उसकी सबसे बड़ी ताकत भी है और कमजोरी भी। कुल मिलाकर, साइप्रस एक बार फिर अपनी भौगोलिक स्थिति की वजह से बड़ी शक्तियों के संघर्ष में फंस गया है। अब उसकी सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह खुद को आने वाले खतरों से कैसे सुरक्षित रखे।


