लखनऊ। अवध क्षेत्र की वरदान गोमती नदी की बदहाली और दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण उसका भूजल से टूटता रिश्ता है। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के पर्यावरणविद प्रो. वेंकटेश दत्ता के अध्ययन में सामने आया है कि गोमती रिवरफ्रंट परियोजना के दौरान बनाई गई कंक्रीट की 16 मीटर गहरी डायफ्राम दीवार ने नदी और भूजल के बीच प्राकृतिक संपर्क को बाधित कर दिया है। इससे नदी के प्रवाह में करीब 60 प्रतिशत तक कमी आ गई है।
स्थिति की गंभीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि गोमती की 26 सहायक नदियों में से 22 पूरी तरह सूख चुकी हैं, जबकि कल्याणी, कथना जैसी शेष चार में ही थोड़ा बहाव बचा है। पीलीभीत, सीतापुर और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र के अनेक प्राकृतिक जलस्रोत भी समाप्त हो रहे हैं। डाॅ. दत्ता ने बताया कि लखनऊ में नदी के कुल प्रवाह का 76 प्रतिशत हिस्सा भूजल से प्राप्त होता है। लगातार भूजल दोहन के कारण जलस्तर अब काफी नीचे पहुंच गया है, जिससे नदी को मिलने वाला प्राकृतिक जल प्रवाह प्रभावित हुआ है।
कब्जों और अतिक्रमण से सिमटा नदी का विस्तार
रिपोर्ट में नदी के बाढ़ क्षेत्र पर बढ़ते अतिक्रमण को भी संकट का प्रमुख कारण बताया गया है। आज देखें तो गोमतीनगर का एक बड़ा हिस्सा गोमती की जमीन पर नदी के पुराने बाढ़ क्षेत्र में ही बसा हुआ है। वर्ष 1970 के बाद तटबंध निर्माण के साथ शुरू हुए कब्जों के कारण नदी का प्राकृतिक विस्तार लगातार सिकुड़ा है। कई स्थानों पर नदी की चौड़ाई और प्रवाह क्षेत्र 100 मीटर तक कम हो गया है।


