Sunday, June 21, 2026
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Lucknow News: लक्ष्य के मुकाबले 10 फीसदी रफ्तार, 31 मार्च तक ऐसे कैसे एलपीजी मुक्त होगा लखनऊ

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लखनऊ। एलपीजी मिलने में होती आसानी ने राजधानी में पीएनजी कनेक्शन की रफ्तार कम कर दी है। नतीजा यह कि अगले नौ महीने में यानी 31 मार्च 2027 तक लखनऊ को एलपीजी मुक्त करने का लक्ष्य फिलहाल दूर की कौड़ी नजर आ रहा है। क्योंकि, हर दिन तय लक्ष्य 1200 कनेक्शन के मुकाबले सिर्फ 150 कनेक्शन तक ही हो पा रहे हैं।

अंतरराष्ट्रीय गैस संकट के बीच सरकार जनता में पीएनजी (पाइप नैचुरल गैस ) को अपनाने पर जोर दे रही है। लखनऊ में हर दिन 1200 कनेक्शन के लक्ष्य के साथ 31 मार्च 2027 तक 3.60 लाख नए पीएनजी कनेक्शन करने हैं। अगर कंपनी तय लक्ष्य भी हासिल करे तो अब तक के कुल 84 हजार कनेक्शनों की संख्या के साथ 31 मार्च तक यह संख्या 4.5 लाख कुल कनेक्शन तक ही पहुंच पाएगी। उधर, एलपीजी मुक्त लखनऊ के लिए एलपीजी उपभोक्ताओं का भी पीएनजी में कन्वर्जन जरूरी है। ऐसे में यह और भी मुश्किल भरा और चुनौतीपूर्ण है। क्योंकि, लखनऊ में ही 15 लाख एलपीजी उपभोक्ता हैं। कंपनी के अधिकारियों के मुताबिक जहां पीएनजी नेटवर्क नहीं है, वहा तक लाइन पहुंचाने में काफी समय लगेगा। अभी जहां पाइपलाइन है, वहां भी सब कहीं कनेक्शन नहीं पहुंच पाए हैं। लिहाजा, एलपीजी मुक्त लखनऊ का लक्ष्य अभी दूर की कौड़ी ही नजर आ रहा है।

एलपीजी की आसान उपलब्धता ने बढ़ाई चुनौती
पीएनजी कनेक्शन के लिए कंपनियां अपार्टमेंट, सोसायटी में कैंप भी लगा रही हैं, लेकिन अब इन कैंपों में लोगों का रुझान खत्म होता जा रहा है। अफसरों का कहना है कि तमाम कोशिशों के बावजूद न नए ग्राहक ही बढ़ रहे हैं, और न ही कोई क्वेरी आ रही है। ऐसे में वह तय किए गए लक्ष्य के मुकाबले कनेक्शन ही नहीं कर पा रहे हैं।

आगरा को भी एलपीजी मुक्त करने की तैयारी
ग्रीन गैस लिमिटेड के अफसरों ने बताया कि सरकार ने भी बड़े शहरों को एलपीजी मुक्त महानगर बनाने का फैसला लिया है। इसके लिए लखनऊ को हर दिन 1200 तो आगरा को 400 कनेक्शन करने हैं, जिससे कि 31 मार्च 2027 तक दोनों महानगर एलपीजी मुक्त घोषित किए जा सकें। लेकिन, लखनऊ में हर रोज 150 तो आगरा में 60-70 कनेक्शन ही हो पा रहे हैं।

लखनऊ में करीब 8000 कनेक्शन, आगरा में 2500
Iएक जनवरी से अब तक लखनऊ में 8000 तो आगरा में 2500 के करीब पीएनजी कनेक्शन हुए हैं। इसमें भी पिछले तीन महीने के अंदर ही लखनऊ में करीब 5500 कनेक्शन किए गए हैं, जबकि औद्योगिक निकायों में 20 कनेक्शन किए गए हैं। अपार्टमेंट व सोसायटीज के नए लोगों में रुझान नहीं दिख रहा है। कैंप में भी लोग कम आ रहे हैं।I
Iप्रवीण सिंह, डीजीएम, मार्केटिंग, ग्रीन गैस लिमिटेडI

लखनऊ गोमती में 60 फीसदी तक घटा प्रवाह, 26 में 22 सहायक नदियां सूखीं

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लखनऊ। अवध क्षेत्र की वरदान गोमती नदी की बदहाली और दुर्दशा का सबसे बड़ा कारण उसका भूजल से टूटता रिश्ता है। बाबासाहेब भीमराव अंबेडकर विश्वविद्यालय के पर्यावरणविद प्रो. वेंकटेश दत्ता के अध्ययन में सामने आया है कि गोमती रिवरफ्रंट परियोजना के दौरान बनाई गई कंक्रीट की 16 मीटर गहरी डायफ्राम दीवार ने नदी और भूजल के बीच प्राकृतिक संपर्क को बाधित कर दिया है। इससे नदी के प्रवाह में करीब 60 प्रतिशत तक कमी आ गई है।
स्थिति की गंभीरता इस तथ्य से समझी जा सकती है कि गोमती की 26 सहायक नदियों में से 22 पूरी तरह सूख चुकी हैं, जबकि कल्याणी, कथना जैसी शेष चार में ही थोड़ा बहाव बचा है। पीलीभीत, सीतापुर और ऊपरी जलग्रहण क्षेत्र के अनेक प्राकृतिक जलस्रोत भी समाप्त हो रहे हैं। डाॅ. दत्ता ने बताया कि लखनऊ में नदी के कुल प्रवाह का 76 प्रतिशत हिस्सा भूजल से प्राप्त होता है। लगातार भूजल दोहन के कारण जलस्तर अब काफी नीचे पहुंच गया है, जिससे नदी को मिलने वाला प्राकृतिक जल प्रवाह प्रभावित हुआ है।

कब्जों और अतिक्रमण से सिमटा नदी का विस्तार

रिपोर्ट में नदी के बाढ़ क्षेत्र पर बढ़ते अतिक्रमण को भी संकट का प्रमुख कारण बताया गया है। आज देखें तो गोमतीनगर का एक बड़ा हिस्सा गोमती की जमीन पर नदी के पुराने बाढ़ क्षेत्र में ही बसा हुआ है। वर्ष 1970 के बाद तटबंध निर्माण के साथ शुरू हुए कब्जों के कारण नदी का प्राकृतिक विस्तार लगातार सिकुड़ा है। कई स्थानों पर नदी की चौड़ाई और प्रवाह क्षेत्र 100 मीटर तक कम हो गया है।

Ram Mandir: महाकुंभ बना था चंदा चोरों के लिए सुनहरा मौका, रोज पार किए 10-15 लाख, आज तफ्तीश करने जाएगी एसआईटी

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महाकुंभ के दौरान राम मंदिर में चंदे की राशि में बड़ा इजाफा हुआ था। गिनती करने वालों को यह बखूबी पता था, इसलिए उन्होंने इसका खूब फायदा उठाया। एक-एक दिन में 10 से 15 लाख रुपये तक चंदे की राशि से पार किए गए। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि कितने बड़े पैमाने पर हेरफेर किया गया और कुल गबन की राशि कितनी बड़ी हो सकती है।दरअसल, महाकुंभ में देश भर से करोड़ों श्रद्धालु प्रयागराज पहुंचे थे। दूर-दूर से आने वाले श्रद्धालुओं ने इस दौरान काशी और अयोध्या में भी दर्शन किए थे। कुंभ के दौरान अयोध्या शहर भी श्रद्धालुओं से भरा था। लाजिमी है कि चंदे की राशि भी आम दिनों की अपेक्षा उस दौरान कई गुना बढ़ी। एक-एक दिन में करोड़ों रुपये की राशि दान में मिली। सूत्रों के मुताबिक, चंदे की राशि पार करने वालों के लिए वह दौर स्वर्णिम हो गया। जितनी चाही, उतनी रकम पार की। विश्वसनीय सूत्रों ने बताया कि कुंभ के दौरान हर दिन 10 से 15 लाख रुपये पार किए गए। तब गिनती भी लंबी चलती थी। आसानी से रकम पार कर ली जाती थी।

जेवरात भी किए पार, नकली सोना रखा गया
चढ़ावे में जेवरात भी चढ़ाए जाते हैं। बड़े पैमाने पर जेवरात दान में दिए जाते हैं। सूत्रों के मुताबिक, नकदी के साथ-साथ जेवरात भी पार किए गए। यही नहीं, असली सोना पार कर नकली भी रखा गया। हालांकि, इस बात की आधिकारिक पुष्टि नहीं है। इसको लेकर चर्चाएं जोरों पर हैं। हकीकत और तथ्य तभी सामने आएंगे, जब निष्पक्षता से मामले की तह तक तफ्तीश की जाएगी। वरना यह मामला दबकर खत्म हो जाएगा।

मामले में सवाल ही सवाल
राम मंदिर के प्रमुख व संवेदनशील कार्यों में से एक कार्य चंदे की राशि की गिनती होता है, जिसके लिए विशेष व्यवस्थाएं की गई हैं। वहां से चंदे की राशि पार कर ले जाना, वह भी इतनी अधिक, संभव नहीं लगता। यह तभी संभव लगता है, जब वहां हर स्तर पर लोगों की मिलीभगत रही हो, खासकर उन लोगों की जो गिनती के कार्य में लगे हों और मंदिर परिसर से बाहर निकलने की प्रक्रिया से जुड़े हों। क्योंकि सवाल उठता है कि सीसीटीवी निगरानी का क्या हुआ? ट्रस्ट व बैंक के जिम्मेदार क्या करते रहे? गिनती करने वालों की तलाशी क्यों नहीं होती थी? ऐसे तमाम सवाल हैं, जिनके जवाब ट्रस्ट के पास नहीं हैं। इसलिए वह चुप्पी साधे हुए है।

Women Health: पुरुषों के मुकाबले महिलाओं में बीमारियों का असर ज्यादा, एनएसएसओ रिपोर्ट में चौंकाने वाला खुलासा

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भारत में बीमारियों का बोझ लगातार बढ़ रहा है और इसका असर महिलाओं पर पुरुषों की तुलना में अधिक दिखाई दे रहा है। स्वास्थ्य मंत्रालय के राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के स्वास्थ्य एवं जीवन स्थितियों से जुड़े नवीनतम आंकड़ों के अनुसार महिलाओं में बीमारियों की दर सामान्यतः पुरुषों से अधिक दर्ज की गई है।विशेष रूप से हड्डी-मांसपेशियों से जुड़ी समस्याएं, उच्च रक्तचाप, थायरॉयड विकार और संक्रमण महिलाओं में ज्यादा पाए गए हैं। वहीं पुरुषों में सीने के दर्द से जुड़े हृदय रोग तथा शारीरिक चोटों के मामले अपेक्षाकृत अधिक दर्ज किए गए हैं। आंकड़े यह भी संकेत देते हैं कि बढ़ती बीमारियां केवल स्वास्थ्य का नहीं बल्कि महिलाओं की सामाजिक, आर्थिक और कार्यक्षमता से जुड़ा गंभीर मुद्दा बनती जा रही हैं।अधिकारियों के अनुसार सर्वेक्षण से पहले के 15 दिनों के भीतर बीमारी दर्ज कराने वालों की संख्या महिलाओं में पुरुषों की तुलना में काफी अधिक रही। प्रति एक लाख आबादी पर पुरुषों में कुल 13,504 बीमारी के मामले दर्ज किए गए, जबकि महिलाओं में यह संख्या 17,006 रही। यह अंतर दर्शाता है कि महिलाओं को स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना अपेक्षाकृत अधिक करना पड़ रहा है। बीमारियों की प्रमुख श्रेणियों में हृदय रोग के 3,523 मामले पुरुषों और 4,273 मामले महिलाओं में दर्ज हुए।

मानसिक स्वास्थ्य के मोर्चे पर भी महिलाओं पर अधिक दबाव
मानसिक एवं न्यूरोलॉजिकल रोगों के आंकड़े भी चिंता बढ़ाने वाले हैं। अवसाद, तनाव, चिंता और तंत्रिका तंत्र से जुड़ी कई समस्याएं महिलाओं में पुरुषों की तुलना में अधिक दर्ज हुईं। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार घरेलू जिम्मेदारियों, कार्यस्थल के दबाव, देखभाल की भूमिका और सामाजिक अपेक्षाओं का संयुक्त प्रभाव महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ सकता है।

श्वसन रोगों में पुरुषों और महिलाओं में अंतर बहुत कम
श्वसन रोगों के मामलों में पुरुषों और महिलाओं के बीच अंतर बहुत कम दिखाई दिया। ऊपरी श्वसन तंत्र संक्रमण, सर्दी-जुकाम और गले की समस्याओं जैसे रोग दोनों वर्गों में लगभग समान स्तर पर दर्ज किए गए। इससे संकेत मिलता है कि कुछ संक्रामक और मौसमी बीमारियां लिंग के आधार पर बहुत अधिक भिन्नता नहीं दिखातीं।

दुधवा नेशनल पार्क की मोटिवेटर नाजरुन निशा को जहरीले सांप ने काटा, खुद ही बाइक चलाकर पहुंचीं अस्पताल

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लखीमपुर खीरी। दुधवा नेशनल पार्क की मोटिवेटर नाजरुन निशा ने एक बार फिर साहसिक काम से सुर्खियां बटोरी हैं। उन्होंने लखीमपुर खीरी के जहरीले सांप करैत को रेस्क्यू किया। इस कार्य के दौरान सांप ने उनको काट भी लिया। इसके बाद भी नाजरुन निशा बाइक चलाकर अस्पताल पहुंच गईं और इलाज कराया।

नाजरुन निशा को सूचना दी गई कि रविवार को लखीमपुर खीरी में एक नाले के पास बेहद जहरीला सांप देखा गया है। नाजरुन निशा ने फिर साहस दिखाया जहरीले सांप को पकड़ा। इस दौरान जहरीले सांप ने उनको काट लिया, लेकिन उन्होंने सांप को नहीं छोड़ा और नाजरुन खुद ही बाइक चलाकर अस्पताल पहुंचीं। उन्होंने वहां पर अपना इलाज कराया।

दुधवा नेशनल पार्क की मोटिवेटर नाजरुन 300 से ज्यादा जहरीले सांपों का रेस्क्यू कर चुकी हैं। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो भी पोस्ट किया और लिखा कि रेस्क्यू के दौरान अचानक मुझे सांप ने काट लिया। घबराने की कोई बात नहीं है, मैंने तुरंत अस्पताल जाकर आवश्यक उपचार और इंजेक्शन लगवा लिया है तथा अब मैं पूरी तरह सुरक्षित हूं।

इसके साथ ही सलाह दी कि यदि किसी को सांप काट ले, तो घबराएं नहीं और किसी भी प्रकार के घरेलू उपचार पर भरोसा न करें। आप तुरंत नज़दीकी अस्पताल पहुंचकर चिकित्सकीय सहायता लें। सही समय पर इलाज ही सबसे बड़ी सुरक्षा है।

दुधवा नेशनल पार्क में ‘मोटिवेटर’ (वन्यजीव रेस्क्यूअर) के रूप में कार्यरत नाजरून निशा साहसी व प्रेरणादायक महिला हैं। लखीमपुर खीरी जिले के अपने गांव में 19 वर्ष की उम्र में सांप पकड़ने की शुरुआत करने वाली नाजरीन अब दुधवा के आस-पास के गांवों के लिए एक रक्षक बन चुकी हैं।

वर्ष 2022 में दुधवा टाइगर रिजर्व में मोटिवेटर के रूप में जुड़ने के बाद उन्होंने वन्यजीव विशेषज्ञों से औपचारिक प्रशिक्षण लिया।निशा अब तक आबादी वाले क्षेत्रों से 300 से अधिक जहरीले सांप और दस से अधिक मगरमच्छ सुरक्षित निकालकर जंगलों में छोड़ चुकी हैं।

उन्होंने महज दो मिनट में एक 18-फुट लंबे विशाल अजगर का रेस्क्यू करके तहलका मचा दिया था, जो कि उनके सबसे कठिन ऑपरेशनों में से एक था। उनके इस साहसिक कार्य से दुधवा से सटे लगभग 50 गांवों के निवासियों को जंगली जानवरों के खतरे से सुरक्षा और राहत मिली है।

क्रू की सैलरी, तेल या मेंटनेस… कहां खर्च होती है भारतीयों विमानों की कमाई; DGCA ने दिया एक-एक पैसे का हिसाब

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नई दिल्ली। आज के समय में व्यक्ति की पहचान के लिए फिंगर प्रिंटिंग का इस्तेमाल किया जाता है। क्राइम की दुनिया में भी अपराधी को पकड़ने के लिए यह एक बड़ा जरिया माना जाता है, लेकिन क्या आप जानते हैं फिंगरप्रिंट तकनीक का ख्याल सबसे पहले किसे आया था?

आपको बता दें कि इस क्रांतिकारी तकनीक की नींव स्कॉटलैंड के चिकित्सक और वैज्ञानिक हेनरी फॉल्ड्स ने रखी थी। उन्होंने दुनिया के सामने यह साबित किया कि हर व्यक्ति की उंगलियों के निशान पूरी तरह से अलग होते हैं। आइए जानें इस महान वैज्ञानिक की कहानी।

13 साल की उम्र में नौकरी

हेनरी फॉल्ड्स का जन्म 1 जून 1843 को स्कॉटलैंड के बीथ शहर में हुआ था। शुरुआत में उनका परिवार काफी खुशहाल और संपन्न था, लेकिन बैंक ऑफ ग्लासगो के डूबने के कारण उनके परिवार पर आर्थिक संकट टूट पड़ा। हालात इतने खराब हो गए कि सिर्फ 13 साल की उम्र में हेनरी को अपनी पढ़ाई छोड़कर नौकरी करनी पड़ी।

उन्होंने अपने करियर की शुरुआत एक क्लर्क के रूप में की और बाद में एक शॉल बनाने वाले के पास ट्रेनी की तरह काम करना शुरू कर दिया, लेकिन हेनरी के अंदर सीखने की ललक कम नहीं हुई थी। कुछ सालों बाद उन्होंने खुद के दम पर दोबारा पढ़ाई शुरू की। उन्होंने ग्लासगो यूनिवर्सिटी से गणित, तर्कशास्त्र और क्लासिक्स की शिक्षा ली। इसके बाद चिकित्सा विज्ञान में अपनी रुचि के चलते उन्होंने एंडरसन कॉलेज से डॉक्टर की डिग्री हासिल की।

भारत से जापान तक दीं अपनी सेवाएं

डॉक्टर बनने के बाद हेनरी फॉल्ड्स चर्च ऑफ स्कॉटलैंड के मेडिकल मिशनरी बन गए। साल 1871 में उन्हें भारत के दार्जिलिंग में स्थित गरीबों के अस्पताल में सेवा देने के लिए भेजा गया। इसके दो साल बाद वे जापान पहुंचे, जहां उन्होंने टोक्यो के सुकिजी इलाके में पहला स्कॉटिश मिशन अस्पताल खोला और मेडिकल छात्रों को पढ़ाने के लिए एक सेंटर भी स्थापित किया।

जापान में रहते हुए उन्होंने हैजा और रेबीज जैसी खतरनाक बीमारियों को फैलने से रोकने में बड़ी भूमिका निभाई। यही नहीं, उन्होंने जापान की पहली नेत्रहीन सहायता संस्था और नेत्रहीनों के लिए स्पेशल स्कूल की शुरुआत करने में भी अपना अहम योगदान दिया।

मिट्टी के बर्तनों से आया फिंगरप्रिंट का ख्याल

1870 के दशक में जब हेनरी टोक्यो में काम कर रहे थे, तब वे एक अमेरिकी आर्कियोलॉजिस्ट एडवर्ड सिल्वेस्टर मोर्स के साथ ओमोरी क्षेत्र में चल रही एक खुदाई को देखने गए। वहां उन्होंने पुराने मिट्टी के बर्तनों पर कुम्हारों की उंगलियों के निशान देखे। बस, यहीं से उनके दिमाग में एक आइडिया आया कि क्या हर व्यक्ति के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं?

इसके बाद उन्होंने कई लोगों के उंगलियों के निशान जमा किए और उन पर गहरा अध्ययन किया। आखिरकार वे इस नतीजे पर पहुंचे कि दुनिया में हर इंसान के फिंगरप्रिंट अलग होते हैं और ये जीवनभर कभी नहीं बदलते।

जब फिंगरप्रिंट से बचाई एक निर्दोष की जान

हेनरी फॉल्ड्स की इस खोज का पहली बार क्राइम फील्ड में इस्तेमाल तब हुआ, जब टोक्यो अस्पताल में चोरी हुई। पुलिस ने शक के आधार पर एक व्यक्ति को आरोपी मान लिया, लेकिन फॉल्ड्स ने घटनास्थल पर मिले फिंगरप्रिंट मिलाकर उस व्यक्ति को निर्दोष साबित किया।

बाद में असली चोर पकड़ा गया और इतिहास में यह पहला केस दर्ज हुआ, जब फिंगरप्रिंट के जरिए किसी को न्याय मिला और असली अपराधी की पहचान हुई। साल 1880 में हेनरी ने नेचर जर्नल में अपना यह खोज पब्लिश कराया और दुनिया को बताया कि अपराध की जांच में फिंगरप्रिंट कितने कारगर साबित हो सकते हैं। इस महान वैज्ञानिक का निधन 24 मार्च 1930 को हुआ, लेकिन उनका यह काम आज भी फॉरेंसिक साइंस की रीढ़ बना हुआ है।

क्रू की सैलरी, तेल या मेंटनेस… कहां खर्च होती है भारतीयों विमानों की कमाई; DGCA ने दिया एक-एक पैसे का हिसाब

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नई दिल्ली। भारत में एविएशन सेक्टर तेजी के साथ बढ़ रहा है। देश में अब फ्लाइट का सफर किसी लग्जरी की जगह जरूरत बनता जा रहा है। इसके लिए हवाई यात्रा को और बेहतर बनाया जा रहा है। देश में नए और बेहतर प्लेन भी शुरू किए जा रहे हैं।

भारत का एविएशन सेक्टर नई ऊंचाइयां छू रहा है। यात्रियों की संख्या तेजी से बढ़ रही है, एयरलाइंस रिकॉर्ड संख्या में विमानों के ऑर्डर देकर अपने बेड़े का विस्तार कर रही हैं और देश भर में नए एयरपोर्ट बनाए जा रहे हैं।

केंद्र सरकार ने भी विमानन बाजार में प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के लिए पिछले साल दिसंबर में नई एयरलाइंस अल हिंद एयर और फ्लाईएक्सप्रेस को परिचालन के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) दे दिया।

इनके अलावा उत्तर प्रदेश स्थित शंख एयर को पहले ही एनओसी मिल चुका है। इस एयरलाइन के 2026 में परिचालन शुरू होने की संभावना है।

एविएशन सेक्टर के लिए सबसे बड़ी चुनौती

भारत के एविएशन सेक्टर की इस विकास की कहानी के पीछे एक बड़ी आर्थिक चुनौती है जो एयरलाइंस के मुनाफे पर भारी पड़ रही है और वो है एविएशन फ्यूल की लागत।

डायरेक्टरेट जनरल ऑफ सिविल एविएशन (DGCA) के वित्त वर्ष 2023-24 के डेटा के मुताबिक, भारतीय एयरलाइंस अपने ऑपरेटिंग खर्च का करीब 40 प्रतिशत विमान के ईंधन और तेल पर खर्च करती हैं।

आसान शब्दों में बात कही जाए तो एयरलाइन पर खर्च होने वाले हर 100 रुपये में से करीब 40 रुपये सिर्फ ईंधन पर खर्च होते हैं।

ये आंकड़े बताते हैं कि तेल ही एयरलाइंस के लिए सबसे बड़ा ऑपरेटिंग खर्च बना हुआ है, जो रखरखाव, यात्री सेवाओं और कर्मचारियों के वेतन सहित अन्य सभी लागतों से कहीं ज्यादा है।

DGCA ने दिया एक-एक पैसे का हिसाब

DGCA के डेटा से पता चलता है कि विमान का ईंधन और तेल कुल ऑपरेटिंग खर्च का 39.4% है। एयरलाइंस टिकट के किराये का सबसे ज्यादा खर्च तेल पर ही खर्च करती हैं।

‘नौकरी से खुश हूं मगर देश सेवा के लिए राजनीति में जाना चाहता हूं; बरेली के हेड कांस्टेबल का इस्तीफा हुआ वायरल

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बरेली। जीआरपी जंक्शन के एक हेड कांस्टेबल मो. जमशेद का त्याग पत्र इंटरनेट मीडिया पर जमकर प्रसारित हो रहा है। जमशेद ने अपने त्यागपत्र में लिखा है कि वह पुलिस की नौकरी से संतुष्ट हैं मगर वर्तमान में देश में सांप्रदायिकता बढ़ती जा रही है।

जिसे काम करने के लिए उन्हें राजनीति में जाना है। जमशेद ने ये पत्र एसएसपी बरेली किये लिखा है। हालांकि, एसएसपी अनुराग आर्य का कहना है कि अभी उन्हें इस बारे में जानकारी नहीं है।

इंटरनेट मीडिया पर प्रसारित पत्र के अनुसार, जमशेद ने लिखा है कि उनकी पोस्टिंग फतेहगंज पूर्वी थाने में हैं मगर वर्तमान में वह जीआरपी बरेली जंक्शन पर तैनात हैं। उन्होंने लिखा है कि जब से उन्होंने पुलिस सेवा ज्वाइन की तब से वर्दी ने उन्हें बहुत सम्मान दिया, वह पुलिस की नौकरी से संतुष्ट हैं।

मगर वर्तमान में देश में सांप्रदायिकता बढ़ती जा रही है। जिससे मेरे भारत मेरे प्रदेश में आदमी एक दूसरे का दुश्मन बन रहा है। उन्होंने आगे लिखा कि वह इस सांप्रदायिकता को कम करने के लिए और देश सेवा के लिए राजनीति में जाना चाहते हैं। जिसकी वजह से पुलिस सेवा से त्यागपत्र दे रहे हैं। मामले में एसपी अनुराग आर्य का कहना है कि अभी उन्हें इस तरह का कोई त्यागपत्र नहीं मिला है नहीं इस मामले की जानकारी है।

सेल्सफोर्स साउथ एशिया की CEO अरुंधति भट्टाचार्य का दावा: भारत के पास है AI का नेतृत्व करने का दम

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नई दिल्ली। सेल्सफोर्स साउथ एशिया की प्रेसिडेंट और सीईओ अरुंधति भट्टाचार्य का कहना है कि अगर भारत अपनी प्रतिभा को शोध और बेहतर कौशल के साथ जोड़ ले, तो देश वैश्विक एआई इकोसिस्टम में बहुत अहम योगदान दे सकता है। भारत के पास एआई में नेतृत्व करने के लिए टैलेंट, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और एंटरप्रेन्योरशिप वाली ऊर्जा है।

भट्टाचार्य ने बताया, “भारत की खास जरूरतों से बहुत सारे नवाचार सामने आएंगे, चाहे वह मल्टीलिंगुअल एआई हो, कम लागत वाले मॉडल हों या ऐसे उपाय जो बहुत बड़े पैमाने पर काम कर सकें। साथ ही, हमें रिसर्च एंड डेवलपमेंट (आरएंडडी) पर और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। सिर्फ प्रतिभा काफी नहीं है।”

एआई की बढ़ती जरूरतों के बीच सबसे टिकाऊ गुण कोई तकनीकी कौशल नहीं, बल्कि जिज्ञासा है।

उन्होंने कहा, “अगर मैंने अपने अलग-अलग पड़ावों वाले सफर से कुछ सीखा है, तो वह यह है कि बदलाव के लिए तैयार रहना, सीखते रहना और जिज्ञासु बने रहना ही लंबे समय तक चलने वाले करियर की पहचान है। काम का भविष्य एआइ से बचकर निकलने के बारे में नहीं है। यह उसका नेतृत्व करने की हिम्मत रखने के बारे में है।”

अब देश भर में मशहूर होगी फिरोजाबाद की कचौड़ी और टिक्की चाट, योगी सरकार दिलाएगी नई पहचान

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फिरोजाबाद। एक जनपद एक व्यंजन (ओडीओसी) योजना के तहत शहर के प्रमुख व्यंजन कचौड़ी और आलू की टिक्की को देश भर पहचान मिलने जा रही है। प्रदेश सरकार द्वारा 25-29 सितंबर के मध्य ग्रेटर नोएडा के इंडिया एक्सपोजीशन मार्ट में उत्तर प्रदेश इंटरनेशनल ट्रेड शो-2026 का आयोजन प्रस्तावित है। इसमें पहली बार ओडीओसी के तहत प्रदेश भर में चयनित प्रमुख व्यंजनों की प्रदर्शनी भी लगाई जाएगी।

योगी सरकार ने प्रदेश के प्रमुख व्यंजनों को बढ़ावा देने के लिए ओडीओसी योजना का शुभारंभ किया। इसमें फिरोजाबाद में दुकानों और ठेलों बनने वाली कचौड़ी और आलू की टिक्की का चयन किया गया है। यह शहर वासियों के लिए सुबह के नाश्ते का प्रमुख व्यंजन है। सुबह से ही दुकानों और ठेलों पर कचौड़ी के शौकीनों की भीड़ लगी रहती है।

ऐसे चार प्रमुख फूड वेंडर्स का चयन दो श्रेणियों में पैकेज्ड उत्पाद और लाइव किचन श्रेणी में करते हुए तत्काल सूचना मुख्यालय को उपलब्ध कराएं, जिससे चयनित फूड वेंडर्स की आवश्यकताओं के अनुरूप व्यवस्थाएं निर्धारित में पूरी की जा सकें।